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मुशर्रफ़ ने वाजपेयी को सलामी क्यों नहीं दी थी? ‘ऑपरेशन सफ़ेद सागर’ में दिखाए कारगिल के सच की पड़ताल

by admin@bebak24.com on | 2026-08-13 15:29:42

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मुशर्रफ़ ने वाजपेयी को सलामी क्यों नहीं दी थी? ‘ऑपरेशन सफ़ेद सागर’ में दिखाए कारगिल के सच की पड़ताल

नई दिल्ली | कारगिल युद्ध पर अब तक कई फ़िल्में और वेब श्रृंखलाएं बन चुकी हैं, लेकिन हाल में प्रदर्शित ‘ऑपरेशन सफ़ेद सागर’ ने इस युद्ध की कहानी को भारतीय वायुसेना के दृष्टिकोण से सामने रखा है। श्रृंखला में कारगिल युद्ध से जुड़े कई घटनाक्रमों को नाटकीय अंदाज़ में दिखाया गया है। इनमें 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ की मुलाकात का एक दृश्य भी शामिल है।

इस दृश्य में मुशर्रफ़ को वाजपेयी को सलामी देने के बजाय उनसे हाथ मिलाते हुए दिखाया गया है। इसके बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या वास्तव में मुशर्रफ़ ने वाजपेयी को सलामी नहीं दी थी और इसके पीछे क्या वजह थी?

लाहौर में वाजपेयी से मिले थे पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख

21 फरवरी 1999 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी लाहौर पहुंचे थे। यह यात्रा भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध सुधारने की कोशिशों के लिहाज़ से बेहद महत्वपूर्ण मानी गई थी।

लाहौर में वाजपेयी की मुलाकात पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के साथ हुई। इसी दौरान पाकिस्तानी सेना के वरिष्ठ अधिकारियों से उनका परिचय कराया गया।

‘ऑपरेशन सफ़ेद सागर’ में दिखाए गए दृश्य के अनुसार, पाकिस्तान नौसेना के प्रमुख एडमिरल फ़सीह बुख़ारी और वायुसेना प्रमुख एयर चीफ़ मार्शल परवेज़ मेहंदी क़ुरैशी ने वाजपेयी को सलामी दी। इसके बाद जब तत्कालीन थलसेना प्रमुख जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ की बारी आई तो उन्होंने सलामी देने के बजाय वाजपेयी से हाथ मिलाया।

यह दृश्य अब चर्चा का विषय बना हुआ है।

क्या मुशर्रफ़ ने जानबूझकर सलामी नहीं दी थी?

इस सवाल पर पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हामिद मीर ने अलग जानकारी दी है।

उनके मुताबिक़, उस समय पाकिस्तान के नौसेना और वायुसेना प्रमुखों ने वर्दी के साथ टोपी भी पहनी हुई थी। इसलिए उन्होंने औपचारिक सैन्य सलामी दी। वहीं मुशर्रफ़ ने वर्दी तो पहनी थी, लेकिन सिर पर टोपी नहीं थी। इसी कारण उन्होंने सलामी देने के बजाय हाथ मिलाया।

इससे यह दावा कमजोर पड़ता है कि मुशर्रफ़ ने जानबूझकर वाजपेयी का अपमान करने के लिए सलामी नहीं दी थी।

हालांकि, ‘ऑपरेशन सफ़ेद सागर’ के लेखक संदीप जैन का कहना है कि श्रृंखला में इस दृश्य के माध्यम से मुशर्रफ़ के व्यक्तित्व और उस समय उनके मन में चल रही रणनीति को दर्शाने की कोशिश की गई।

क्या मुशर्रफ़ पहले ही कारगिल की योजना बना चुके थे?

कारगिल युद्ध के संदर्भ में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है।

‘ऑपरेशन सफ़ेद सागर’ में मुशर्रफ़ को कारगिल अभियान की योजना बनाने वाले प्रमुख व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। श्रृंखला में यह भी दिखाया गया है कि पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को इस योजना की पूरी जानकारी नहीं थी।

हालांकि, इस विषय पर ऐतिहासिक दावे एक जैसे नहीं हैं।

नवाज़ शरीफ़ ने बाद में दावा किया था कि उन्हें कारगिल अभियान के बारे में पूरी जानकारी नहीं दी गई थी। दूसरी ओर, मुशर्रफ़ ने इसका खंडन करते हुए दावा किया था कि शरीफ़ को इसकी जानकारी थी।

इसलिए यह मुद्दा आज भी इतिहासकारों और रक्षा विशेषज्ञों के बीच बहस का विषय है।

आगरा में मुशर्रफ़ को सलामी न देने की कहानी भी चर्चा में

‘ऑपरेशन सफ़ेद सागर’ के बाद 2001 की एक दूसरी घटना भी चर्चा में आ गई है।

कहा जाता है कि तत्कालीन भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ़ मार्शल एवाई टिपनिस ने मुशर्रफ़ को सलामी नहीं दी थी। हालांकि, यह घटना आगरा में नहीं, बल्कि 14 जुलाई 2001 को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में हुई थी।

रिपोर्टों के मुताबिक़, टिपनिस ने सैन्य सलामी देने के बजाय मुशर्रफ़ से हाथ मिलाया था।

बाद में टिपनिस ने भी कहा था कि पाकिस्तानी सेना के भारतीय सैनिकों के प्रति रवैये को देखते हुए उन्होंने सलामी देना आवश्यक नहीं समझा और शिष्टाचार के तौर पर हाथ मिलाया।

इस घटना को कई बार 1999 में वाजपेयी के साथ मुशर्रफ़ के व्यवहार से जोड़कर देखा गया है, हालांकि इसे सीधे तौर पर ‘बदले’ की कार्रवाई कहना उचित नहीं होगा।

कारगिल युद्ध में सेना और वायुसेना के बीच मतभेद भी सामने आए

‘ऑपरेशन सफ़ेद सागर’ में कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय थलसेना और वायुसेना के बीच तालमेल को भी दिखाया गया है।

वास्तविक इतिहास में दोनों सेनाओं के बीच कुछ मुद्दों पर मतभेद सामने आए थे। तत्कालीन वायुसेना प्रमुख एवाई टिपनिस के अनुसार, 10 मई से 25 मई 1999 के बीच दोनों सेनाओं के बीच संयुक्त योजना को लेकर गंभीर मतभेद थे।

हेलिकॉप्टरों के इस्तेमाल को लेकर भी चर्चा हुई। वायुसेना ने चेतावनी दी थी कि ऊंचाई वाले इलाकों में हेलिकॉप्टर पाकिस्तानी सैनिकों की स्टिंगर मिसाइलों का आसान निशाना बन सकते हैं।

बाद में सरकार की मंज़ूरी के बाद वायुसेना ने अभियान शुरू किया। 28 मई 1999 को एक एमआई-17 हेलिकॉप्टर को स्टिंगर मिसाइल से निशाना बनाया गया, जिसमें चार वायुसैनिकों की मौत हुई।

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा की मौत

कारगिल युद्ध की सबसे दर्दनाक घटनाओं में स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा की मौत भी शामिल है।

लेफ्टिनेंट के. नचिकेता के विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद अजय आहूजा उनके विमान की तलाश में निकले थे। इसी दौरान उनके विमान को पाकिस्तानी ठिकाने से दागी गई मिसाइल ने निशाना बनाया।

आहूजा ने विमान से बाहर निकलने के लिए इजेक्शन किया, लेकिन बाद में उनकी मौत हो गई।

भारत की आधिकारिक जांच और पोस्टमॉर्टम से जुड़े विवरणों के अनुसार, जमीन पर उतरने के बाद उन्हें गोली मारी गई थी। यह घटना कारगिल युद्ध में भारतीय वायुसेना के लिए सबसे गंभीर और भावनात्मक घटनाओं में से एक बनी।

‘गोल्डन ऐरोज़’ की भूमिका क्या थी?

कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना की 17वीं स्क्वाड्रन ‘गोल्डन ऐरोज़’ की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

शुरुआत में इसका मुख्य काम दुश्मन की गतिविधियों की टोह लेना और तस्वीरें जुटाना था। बाद में परिस्थितियों के अनुसार इसके कुछ विमानों को बमबारी की भूमिका भी दी गई।

यही स्क्वाड्रन बाद के वर्षों में भारतीय वायुसेना के अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों के संचालन से भी जुड़ी।

कारगिल युद्ध में क्या हुआ था?

कारगिल युद्ध मई से जुलाई 1999 के बीच भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ था।

पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों ने कारगिल क्षेत्र की ऊंची पहाड़ियों पर कई रणनीतिक स्थानों पर कब्ज़ा कर लिया था। भारतीय सेना को इन ठिकानों को वापस हासिल करने के लिए कठिन लड़ाई लड़नी पड़ी।

इस युद्ध में भारतीय वायुसेना ने ‘ऑपरेशन सफ़ेद सागर’ के तहत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं भारतीय थलसेना ने ऊंची और बेहद कठिन पहाड़ियों पर जाकर पाकिस्तानी ठिकानों को एक-एक करके खाली कराया।

कारगिल युद्ध में भारत के 527 सैनिक शहीद हुए और 1363 सैनिक घायल हुए।

भारतीय वायुसेना और बोफ़ोर्स तोपों की कार्रवाई ने पाकिस्तानी ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया और अंततः भारतीय सेना ने अधिकतर रणनीतिक चोटियों पर दोबारा कब्ज़ा कर लिया।

वेब श्रृंखला और इतिहास में अंतर समझना जरूरी

‘ऑपरेशन सफ़ेद सागर’ ने कारगिल युद्ध से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रसंगों को फिर से चर्चा में ला दिया है। हालांकि, किसी भी वेब श्रृंखला को पूरी तरह ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं माना जा सकता।

नाटकीय प्रभाव के लिए घटनाओं, संवादों और पात्रों के व्यवहार में बदलाव किया जा सकता है। इसलिए मुशर्रफ़ द्वारा वाजपेयी को सलामी न देने जैसी घटनाओं को देखते समय श्रृंखला में दिखाई गई प्रस्तुति और उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाणों के बीच अंतर करना जरूरी है।

इतिहास के उपलब्ध विवरणों के आधार पर यह स्पष्ट है कि 1999 में वाजपेयी और मुशर्रफ़ की मुलाकात हुई थी और मुशर्रफ़ ने उनसे हाथ मिलाया था। लेकिन उन्होंने ऐसा जानबूझकर अपमान के लिए किया था या सैन्य वेशभूषा के कारण औपचारिक सलामी नहीं दी थी—इस पर अलग-अलग दावे मौजूद हैं।

यही वजह है कि ‘ऑपरेशन सफ़ेद सागर’ में दिखाई गई इस घटना ने एक बार फिर कारगिल युद्ध, मुशर्रफ़ की भूमिका और भारत-पाकिस्तान संबंधों के उस दौर को लेकर बहस तेज कर दी है।



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