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राजनीतिक रसूख का गढ़, आर्थिक बदहाली का शिकार: आखिर किसका मुंह जोह रहा 'मिनी कोलकाता' मोकामा?

by admin@gmail.com on | 2025-11-22 11:42:10

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राजनीतिक रसूख का गढ़, आर्थिक बदहाली का शिकार: आखिर किसका मुंह जोह रहा 'मिनी कोलकाता' मोकामा?

संतोष राय ,

बिहार के राजनीतिक मानचित्र पर मोकामा की लकीरें हमेशा से गहरी और निर्णायक रही हैं। गंगा किनारे बसा यह क्षेत्र सिर्फ एक विधानसभा या लोकसभा का हिस्सा भर नहीं है, बल्कि यह बिहार की राजनीति की धुरी रहा है। यह वह उर्वर धरती है जिसने संघर्ष के दिनों में नीतीश कुमार को संसद तक पहुँचाया, जिसने आज केंद्र की राजनीति में सशक्त हस्तक्षेप रखने वाले ललन सिंह को सिरमौर बनाया, और जिसने राज्य को उपमुख्यमंत्री के रूप में विजय कुमार सिन्हा जैसा नेतृत्व दिया। बाहुबली अनंत सिंह का प्रभाव क्षेत्र भी यही रहा है बेबाक बोल वाले छोटे सरकार को हर मोड़ पर यहां की जनता ने सीधा रास्ता दिखाया ।

मोकामा ने जिसे भी अपना माना, उसे फलक पर बैठाए रखा। हालिया लोकसभा चुनावों के परिणाम इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। मुंगेर लोकसभा के अंतर्गत आने वाले मोकामा ने जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और वर्तमान केंद्रीय मंत्री  ललन सिंह  को ऐतिहासिक बढ़त दिलाकर यह साबित किया कि यहाँ की जनता अपने नेतृत्व पर अटूट विश्वास रखती है। यह प्रचंड विजय सिर्फ एक चुनावी आंकड़ा नहीं, बल्कि मोकामा की एकजुटता और विकास की आस का उद्घोष थी।

लेकिन, इस चमकदार राजनीतिक तस्वीर का एक दूसरा, स्याह पहलू भी है। राजनीतिक रूप से इतना सशक्त मोकामा, आर्थिक रूप से आज 'बीमार' क्यों है?

एक दौर था जब मोकामा को पूर्वी भारत का 'मिनी कोलकाता' कहा जाता था। यह बिहार का औद्योगिक हृदय था। बाटा, ब्रिटानिया जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कारखानों की सायरन यहाँ की सुबह की शुरुआत करती थीं। हजारों मजदूरों के कदमों की आहट से यह शहर जीवंत रहता था। लेकिन आज, वह गौरवशाली अतीत बंद पड़ी फैक्ट्रियों के जंग खाते तालों और वीरान पड़े औद्योगिक शेडों में कहीं खो गया है। मोकामा ने पिछले दशकों में बहुत कुछ खोया है—अपनी पहचान, अपना रोजगार और अपने युवाओं का भविष्य।

यहाँ का ठप पड़ा व्यावसायिक ढांचा आज भी अपनी बदहाली की कहानी कह रहा है। यह एक बड़ा विरोधाभास है कि जिस क्षेत्र ने राज्य और केंद्र को इतने कद्दावर नेता दिए, वही क्षेत्र आज विकास की मुख्यधारा से कटकर अपनी बारी का इंतजार कर रहा है। आखिर मोकामा के बंद कारखाने अब किसका मुंह जोह रहे हैं?

भौगोलिक दृष्टि से देखें तो मोकामा आज भी संभावनाओं का केंद्र है। यह कई राज्यों को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण जंक्शन है। यहाँ संसाधन हैं, पर्याप्त श्रमशक्ति है, भूमि की उपलब्धता है, और रेल-सड़क परिवहन का बेहतरीन नेटवर्क है। गंगा के जलमार्ग से जुड़ने की असीम संभावनाएं हैं। यदि मोकामा का औद्योगिक पुनर्जागरण होता है, तो इसका सकारात्मक आर्थिक प्रभाव सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आसपास के राज्यों तक भी पहुँचेगा।

मोकामा के समग्र पुनर्जागरण के लिए वर्तमान समय से बेहतर कुछ नहीं हो सकता। आज बिहार में एक मजबूत एनडीए सरकार है और केंद्र में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में स्थिर और सशक्त सरकार है। जिस 'डबल इंजन' की सरकार के दम पर बिहार में विकास के दावे किए जाते हैं, मोकामा उस विकास का सबसे हकदार उम्मीदवार है।

जनता ने अपना काम कर दिया है। उन्होंने अपने नेताओं पर छप्पर फाड़कर विश्वास जताया है। अब बारी नेतृत्व की है। विशेष रूप से सांसद ललन सिंह जी और उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा  से मोकामा को बहुत उम्मीदें हैं। यह समय चुनावी वादों से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने का है। मोकामा के ठप पड़े विकास रथ को फिर से गति देनी होगी, बंद पड़ी मिलों की चिमनियों से फिर धुआं निकालना होगा।

मोकामा सिर्फ अपने राजनीतिक अतीत पर जिंदा नहीं रह सकता। उसे अपने आर्थिक भविष्य को संवारना ही होगा, ताकि 'मिनी कोलकाता' की उसकी ऐतिहासिक पहचान सिर्फ किताबों में सिमट कर न रह जाए।



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