by admin@bebak24.com on | 2025-11-20 14:04:47
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अजय सिंह
सोनभद्र (उत्तर प्रदेश): उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले का बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार विकास के लिए नहीं, बल्कि त्रासदी के लिए। 15 तारीख (शनिवार) को हुए एक दर्दनाक खनन हादसे ने सात गरीब मजदूरों को काल के गाल में समा लिया, जिसने क्षेत्र में दशकों से चल रहे खनन कार्य की सुरक्षा, नैतिकता और सियासत पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।
मौतों पर पैसों का मरहम: एक असहनीय सौदा
हादसे के बाद जो पहली और सबसे दुखद तस्वीर सामने आती है, वह है पीड़ित परिवारों का अकेलापन और उन पर पैसों का मरहम लगाने का खेल। सात मासूम जिंदगियों को खोने के बाद, तुरंत ही अधिकारी, खननकर्ता और सफेदपोश नेताओं का 'गढ़जोड़' सक्रिय हो गया। मुआवजे के नाम पर दी गई राशि भले ही तत्काल राहत दे, लेकिन यह उन मासूमों के लिए रोटी का स्थायी इंतज़ाम नहीं कर सकती, जिन्होंने अपने घर का एकमात्र कमाने वाला खो दिया है।
प्रश्न: क्या ये पैसे उन बच्चों को पिता का साया, प्यार और सुरक्षित भविष्य दे सकते हैं? जब घर में रोटी कमाने वाला कोई नहीं बचा, तो ये परिवार जीवन चलाने के लिए इसी "गढ़जोड़" पर निर्भर होने को क्यों मजबूर हो जाते हैं? यह त्रासदी केवल मजदूरों की मौत नहीं, बल्कि गरीब परिवारों के भविष्य की हत्या है।
खनन बंद हो या सुरक्षा बढ़े? आजीविका का बड़ा सवाल
यह हादसा एक मूलभूत प्रश्न खड़ा करता है: क्या खनन कार्य को पूरी तरह से बंद कर देना ही एकमात्र उपाय है?
* समाधान 'बंद करना': यदि खनन को बंद कर दिया जाता है, तो दुर्घटनाएं रुक जाएंगी।
* परिणाम 'आजीविका का संकट': लेकिन, इसका दूसरा पक्ष भयानक है। सोनभद्र का यह क्षेत्र लाखों गरीब परिवारों और छोटे व्यापारियों के लिए आजीविका का एकमात्र साधन है। हजारों ट्रक ड्राइवर, हेल्पर, मशीनिस्ट, स्थानीय कारीगर और छोटे कारोबारी सीधे तौर पर इस व्यवसाय पर निर्भर हैं। अगर यह उद्योग बंद होता है, तो लाखों लोग भुखमरी के कगार पर आ जाएंगे, जिससे एक बड़ा सामाजिक और आर्थिक संकट खड़ा होगा।
शायद यही कारण है कि जान गंवाने का खतरा होने के बावजूद भी मजदूर बार-बार इन खदानों में काम करने लौट आते हैं—यह भूख और मजबूरी का संघर्ष है।
खनन सिंडिकेट की गहरी जड़ें: नेताओं से लेकर माफिया तक
सोनभद्र में खनन कार्य केवल पत्थरों को निकालने का काम नहीं है, बल्कि यह एक गहरे और मजबूत सिंडिकेट का प्रतीक है। इस सिंडिकेट की जड़ें राजनीतिक गलियारों में दूर तक फैली हैं।
* राजनीतिक संरक्षण: सपा, बसपा और भाजपा—तीनों प्रमुख दलों के बड़े नेताओं का पैसा इस अवैध कारोबार में लगा हुआ है, जिससे इसकी अवैधता को एक अदृश्य राजनीतिक सुरक्षा कवच मिला हुआ है।
माफिया गठजोड़:
- मुख्तार अंसारी के करीबी अतुल राय, उमेर खां, और राकेश जायसवाल जैसे नाम इस सिंडिकेट को संभालने में सक्रिय रहे हैं।
- हाल के पांच वर्षों में, बाहुबली बृजेश सिंह गैंग के अजय सिंह खलनायक की दखल भी बालू और पहाड़ के खेल में बढ़ी है।
- मनोज सिंह और राजेश यादव को सिंडिकेट के 'मैनेजर' के रूप में देखा जाता है।
- एक वरिष्ठ पत्रकार और खनन व्यवसायी पर्दे के पीछे से पूरे तंत्र को 'मैनेज' करते हैं।
- बाहुबली विनीत सिंह का सिंडिकेट भी मिर्जापुर से सोनभद्र तक सक्रिय है, जो फिलहाल बंद पड़ी दो बालू खदानों में सक्रिय रहा है, और इस क्षेत्र से भारी अवैध खनन कर अपना खजाना भरता है।
यह गठजोड़ सुनिश्चित करता है कि सुरक्षा नियमों का उल्लंघन हो, गरीब मजदूरों के जीवन को खतरे में डाला जाए, और हादसे के बाद 'मामले को रफा-दफा' करने में देर न लगे।
निष्कर्ष: ईमानदारी और सुरक्षा ही एकमात्र उपाय
खनन कार्य को पूरी तरह बंद करना व्यावहारिक समाधान नहीं है, क्योंकि यह लाखों लोगों की आजीविका छीन लेगा। इसका एकमात्र मानवीय और टिकाऊ समाधान है:
- सुरक्षा सर्वोपरि: खनन क्षेत्रों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के सुरक्षा मानकों को सख्ती से लागू किया जाए। मशीनों और उपकरणों की नियमित जाँच हो। मजदूरों को उचित प्रशिक्षण और सुरक्षा उपकरण (PPE) दिए जाएं।
- ईमानदार कार्रवाई: खनन सिंडिकेट और उसे संरक्षण देने वाले सफेदपोश नेताओं पर कड़ी, निष्पक्ष और त्वरित कानूनी कार्रवाई हो। अवैध खनन को सख्ती से रोका जाए।
- मजदूरों का भविष्य: मृतक मजदूरों के बच्चों के लिए नकद मुआवजे के बजाय, सरकारी नौकरी, बच्चों की निःशुल्क शिक्षा, और स्थायी मासिक पेंशन की व्यवस्था हो, ताकि उनका भविष्य सुरक्षित हो सके।
सोनभद्र का यह हादसा हमें याद दिलाता है कि विकास की कीमत पर किसी का जीवन दांव पर नहीं लगाया जा सकता।
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