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जंतर-मंतर संग्राम— सीजेपी आंदोलन और सरकार के वे 4 बड़े फैसले, जिन्होंने पैदा किया भारी 'कन्फ्यूजन'

by on | 2026-07-21 19:28:08

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जंतर-मंतर संग्राम— सीजेपी आंदोलन और सरकार के वे 4 बड़े फैसले, जिन्होंने पैदा किया भारी 'कन्फ्यूजन'

नई दिल्ली: 20 जुलाई 2026 को दिल्ली की सड़कों पर उतरा कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का 'संसद मार्च' भारत के हालिया राजनीतिक इतिहास में एक मील का पत्थर बन चुका है। नीट (NEET) पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था में सुधार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर हजारों युवाओं का जंतर-मंतर पर जमावड़ा केवल एक छात्र आंदोलन नहीं, बल्कि सरकार के खिलाफ उबलते असंतोष की गवाही दे रहा है।

हालांकि, 20 जुलाई के इस ऐतिहासिक घटनाक्रम के दौरान सरकार और सीजेपी दोनों ही पक्षों की तरफ से कई ऐसे फैसले और बयान सामने आए, जिन्होंने पूरे घटनाक्रम के टाइमलाइन को उलझा दिया है और जनता के मन में कई गंभीर सवाल व कन्फ्यूजन खड़े कर दिए हैं।

दिल्ली पुलिस कमिश्नर सतीश गोलचा की अचानक विदाई: प्रशासनिक विफलता या गाज?

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 17 जुलाई को अचानक दिल्ली पुलिस कमिश्नर सतीश गोलचा को समय से पहले पद से हटाकर 1994 बैच के आईपीएस अधिकारी अनुराग कुमार को नया कमिश्नर नियुक्त कर दिया।

  • अंदरूनी वजह: प्रमुख अंग्रेजी अखबारों ('द इंडियन एक्सप्रेस' और 'द टेलीग्राफ') की रिपोर्टों के मुताबिक, गृह मंत्रालय गोलचा के कुछ प्रशासनिक फैसलों से संतुष्ट नहीं था, जिसमें जंतर-मंतर पर सीजेपी आंदोलन को हैंडल करने का ढीला तरीका मुख्य कारण रहा।

  • समय पर सवाल: यह कार्रवाई संसद के मॉनसून सत्र और 20 जुलाई के प्रस्तावित मार्च से ठीक तीन दिन पहले की गई। पिछले एक साल के भीतर दूसरी बार दिल्ली पुलिस प्रमुख का अचानक तबादला यह साफ संकेत देता है कि सरकार आंदोलन की जमीनी पकड़ का अंदाजा लगाने में पूरी तरह विफल रही थी।

जेपी नड्डा से मुलाकात और पीएम मोदी की 'रहस्यमयी उपेक्षा'

सोमवार को जब जंतर-मंतर पर हजारों प्रदर्शनकारी बैरिकेड्स तोड़कर संसद की ओर बढ़ रहे थे, तब एक तरफ केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने सीजेपी प्रवक्ताओं (सौरव दास और आशुतोष रांका) से मुलाकात की।

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               │    जेपी नड्डा - सीजेपी वार्ता कन्फ्यूजन    │
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│   CJP का दावा:            │                         │   सरकार (नड्डा) का दावा: │
│ "सरकार ने बातचीत के लिए  │   VS.                   │ "सीजेपी की तरफ से पहले   │
│  खुद संपर्क किया"       │                         │  प्रस्ताव आया था"        │
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  • कॉल किसने किया?: नड्डा का कहना था कि प्रदर्शनकारियों ने संपर्क किया, जबकि सीजेपी का दावा था कि सरकार ने बातचीत के लिए हाथ बढ़ाया। इस 10 मिनट की मुलाकात के बाद भी धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर कोई नतीजा नहीं निकला।

  • पीएम का संसद संबोधन: ठीक उसी समय संसद परिसर में पीएम नरेंद्र मोदी का परंपरागत संबोधन हुआ। उन्होंने जंतर-मंतर पर चल रहे इस ऐतिहासिक युवा आंदोलन पर एक शब्द भी नहीं कहा। बल्कि, हैदराबाद की एक निजी रॉकेट कंपनी की सराहना करते हुए राहुल गांधी पर तंज कसा कि "यह उपलब्धि 28 साल के युवाओं ने हासिल की है, किसी 56 साल के युवा ने नहीं।" इस बयान को मौके के संदर्भ से अलग और टालने वाला माना गया।

सोनम वांगचुक का जबरन अस्पताल ट्रांसफर और उनकी अजीबोगरीब शर्त

आंदोलन को बल देने वाले प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को पुलिस ने जंतर-मंतर से जबरन उठाकर एम्स/अस्पताल में भर्ती कराया। लेकिन इससे पहले उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो के बयान ने आंदोलनकारियों को हैरान कर दिया:

  • क्या थी शर्त?: वांगचुक ने कहा कि वे अनशन तोड़ देंगे यदि विपक्षी दलों के नेता उनसे मिलकर यह भरोसा दें कि वे संसद में शिक्षा का मुद्दा उठाएंगे।

  • प्रोफेसर अपूर्वानंद का तीखा हमला: जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अपूर्वानंद ने इस पर सवाल उठाते हुए लिखा कि "यह बेहद निराशाजनक है। वांगचुक ने जवाबदेही का बोझ सत्ता पक्ष (सरकार) से हटाकर विपक्ष पर डाल दिया। अब वांगचुक पृष्ठभूमि में चले गए हैं और सड़कों पर उतरी जनता इस आंदोलन का असली केंद्र बन गई है।"

अभिजीत दीपके का अचानक अनशन शुरू करना और 24 घंटे में तोड़ देना

सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके के रुख ने भी समर्थकों के बीच कई तरह के सवाल खड़े किए:

  • 24 घंटे का ड्रामा?: वांगचुक को अस्पताल ले जाने के बाद दीपके ने आमरण अनशन का ऐलान किया, लेकिन सोमवार सुबह ही सोनम वांगचुक की अपील का हवाला देकर जूस पीकर अनशन समाप्त कर दिया।

  • बैकग्राउंड पर घमासान: दीपके अतीत में 'आम आदमी पार्टी' (AAP) के वॉलंटियर रह चुके हैं, जिसे लेकर बीजेपी उन पर 'राजनीतिक रूप से प्रायोजित' होने का आरोप लगाती रही है। हालांकि, वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि सीजेपी ने बेहद कम समय में अपना घोषणापत्र, वेबसाइट और राष्ट्रव्यापी गान तैयार करके यह साबित किया है कि यह केवल एक क्षणिक गुस्सा नहीं, बल्कि सुनियोजित राजनीतिक विकल्प बनने की दिशा में कदम है।

बेबाक24 टेक

जंतर-मंतर का यह संग्राम दो अलग-अलग कहानियों का मिश्रण बन गया है। एक तरफ दिल्ली पुलिस आयुक्त का तबादला और जेपी नड्डा का आनन-फानन में बैठक करना यह दर्शाता है कि सरकार बैकफुट पर है और बैकचैनल के जरिए डैमेज कंट्रोल में जुटी है। दूसरी तरफ, पीएम मोदी की चुप्पी और अभिजीत दीपके व वांगचुक के बार-बार बदलते रुख से आम जनता और छात्रों में यह भ्रम बना हुआ है कि इस आंदोलन का अंतिम पड़ाव क्या होगा?

बेबाक24 का राजनीतिक विश्लेषण कहता है कि सरकार अगर यह सोच रही है कि वांगचुक को अस्पताल भेजने या भाषणों में चुटकुलों से यह आंदोलन ठंडा पड़ जाएगा, तो यह उसकी बहुत बड़ी गलतफहमी होगी। दिल्ली की सड़कों पर बहा छात्रों का खून और आंसू गैस का धुआं यह बता रहा है कि बात अब सीजेपी के नेताओं से आगे निकलकर सीधे देश की युवा आबादी के वजूद की लड़ाई बन चुकी है।



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