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बुलडोजर एक्शन पर हाईकोर्ट का बड़ा मोड़: 'FIR दर्ज होना घर गिराने का आधार नहीं', split verdict के बाद मामला तीसरे जज के पास

by on | 2026-07-21 19:01:37

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बुलडोजर एक्शन पर हाईकोर्ट का बड़ा मोड़: 'FIR दर्ज होना घर गिराने का आधार नहीं', split verdict के बाद मामला तीसरे जज के पास

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य में आपराधिक मामलों के आरोपियों के घरों पर प्रशासनिक 'बुलडोजर कार्रवाई' को लेकर एक बड़ा और महत्वपूर्ण कानूनी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि केवल किसी व्यक्ति के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज हो जाने से उसका मकान या संपत्ति ढहाने का अधिकार प्रशासन को नहीं मिल जाता।

​हालांकि, इस मामले पर दो जजों की खंडपीठ में एकराय न बन पाने के कारण अब यह विवाद अंतिम निर्णय के लिए मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित तीसरे जज की पीठ के समक्ष भेजा गया है।

​ एफआईआर के आधार पर कार्रवाई प्रतिशोध: जस्टिस अतुल श्रीधरन

​सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि नगर निगम या विकास प्राधिकरण के नियमों का बहाना बनाकर किसी आरोपी के मकान को तुरंत ध्वस्त करना 'प्रतिशोध की कार्रवाई' जैसा प्रतीत होता है। उन्होंने सुझाव दिया कि:

2 साल की मोहलत: एफआईआर दर्ज होने के बाद कम से कम दो साल तक आरोपी का घर नहीं गिराया जाना चाहिए, जब तक कि कोई अति आवश्यक सार्वजनिक कारण न हो।


1 साल का नोटिस: यदि अवैध निर्माण सालों पुराना है, तो उसे ध्वस्त करने से पूर्व आरोपी को एक साल का नोटिस मिलना चाहिए ताकि वह वैधानिक या वैकल्पिक व्यवस्था कर सके।


​ 'अनुच्छेद 226 के तहत सामान्य रोक संभव नहीं': जस्टिस सिद्धार्थ नंदन

​खंडपीठ के दूसरे सदस्य न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने इन सुझावों से असहमति जताई। उनका मानना था कि:

​संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अदालत कानून के क्रियान्वयन पर इस प्रकार दो साल की सामान्य रोक (General Stay) नहीं लगा सकती।


​एक साल पूर्व नोटिस देने की शर्त वर्तमान कानूनों में शामिल नहीं है, इसलिए अदालत इसे अनिवार्य नहीं बना सकती। इससे अवैध निर्माणकर्ताओं को अनुचित लाभ मिल सकता है।


​ भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्रवाई पर बनी सहमति

​भले ही दोनों न्यायाधीशों के बीच मुख्य बिंदु पर भिन्न राय रही, लेकिन दो प्रमुख विषयों पर दोनों पूरी तरह सहमत दिखे:

अधिकारियों पर शिकंजा: अवैध निर्माण के मामलों में केवल संपत्ति मालिक ही नहीं, बल्कि इसे बनने देने या गलत मंजूरी देने वाले अधिकारियों पर भी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत 6 महीने के भीतर जांच पूरी कर कार्रवाई की जाए।


मनमानी पर रोक (Pick & Choose): विकास प्राधिकरण किसी व्यक्ति विशेष को चुनकर (Selective Action) कार्रवाई नहीं कर सकता। यदि ऐसा होता है, तो नागरिक अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।


​ क्या है पूरा मामला?

​यह पूरा मामला हमीरपुर के चर्चित पॉक्सो, धर्मांतरण और अवैध निर्माण से जुड़ा है। फैमुद्दीन व अन्य याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल कर कहा था कि उनके रिश्तेदार पर गंभीर धाराओं में केस दर्ज है, लेकिन प्रशासन बिना नोटिस दिए उनसे असंबद्ध संपत्तियों (लॉज और आरा मिल) को सील व ध्वस्त करने की तैयारी कर रहा है।

​दूसरी ओर, राज्य सरकार का पक्ष था कि विवादित 'इंडियन लॉज' सिंचाई विभाग की जमीन पर कब्जा करके बनाया गया है और वहां गंभीर अपराध घटित हुए हैं, जिसके चलते विधिक प्रक्रिया के तहत ही कार्रवाई की जा रही है।

​ आगे क्या?

​दो जजों की राय अलग-अलग (Split Verdict) होने के कारण मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को संदर्भित किया गया है। अब मुख्य न्यायाधीश द्वारा गठित नई पीठ या तीसरे जज का फैसला ही यह तय करेगा कि प्रदेश में बुलडोजर कार्रवाई को लेकर भविष्य की कानूनी दिशा क्या होगी।



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