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जंतर-मंतर पर पत्रकारों से बदसलूकी! 'गोदी मीडिया' बनाम 'स्वतंत्र पत्रकारिता' की बहस में आपस में भिड़े देश के बड़े पत्रकार

by admin@bebak24.com on | 2026-07-21 16:32:47

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जंतर-मंतर पर पत्रकारों से बदसलूकी! 'गोदी मीडिया' बनाम 'स्वतंत्र पत्रकारिता' की बहस में आपस में भिड़े देश के बड़े पत्रकार

नई दिल्ली: कॉकरोच जनता पार्टी के 'संसद मार्च' के दौरान जंतर-मंतर पर सिर्फ पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच ही टकराव नहीं हुआ, बल्कि इस आंदोलन ने भारतीय मीडिया जगत के भीतर चल रहे गहरे ध्रुवीकरण को भी पूरी तरह से बेनकाब कर दिया है। प्रदर्शन के दौरान जब भीड़ ने कुछ टीवी रिपोर्टरों को 'सरकार परस्त' या 'गोदी मीडिया' मानकर उनके खिलाफ नारेबाजी की, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर देश के शीर्ष पत्रकारों के बीच एक तीखी बहस छिड़ गई।

'बेबाक24' के मीडिया डेस्क की विशेष रिपोर्ट, जानिए एक्स पर किसने क्या कहा और कैसे बंटा मीडिया जगत:

'एक्स' (X) पर छिड़ा महायुद्ध: एंकर का पाप, रिपोर्टर को सजा?

इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब यह सवाल उठा कि क्या टीवी स्टूडियो के वातानुकूलित कमरों में बैठकर नफरत फैलाने वाले एंकरों के फैसलों की सजा तपती धूप में ग्राउंड पर काम करने वाले युवा रिपोर्टरों को मिलनी चाहिए?

इस मुद्दे पर देश के जाने-माने पत्रकारों ने अलग-अलग खेमों में बंटकर अपनी राय रखी। नीचे दी गई टेबल में देखिए किसने किस विचार का समर्थन किया:

पत्रकार का नामबहस में मुख्य तर्क / स्टैंड
पूनम पांडे / विजेता सिंह (द हिंदू)रिपोर्टरों का बचाव: फील्ड रिपोर्टर बहुत मेहनती होते हैं। स्टूडियो में नफरत फैलाने वाले एंकरों और ग्राउंड पर काम करने वाले युवा रिपोर्टरों के बीच फर्क करना बेहद जरूरी है।
शेखर गुप्ता (द प्रिंट)भीड़ के न्याय का विरोध: हम भीड़ को यह तय करने का हक नहीं दे सकते कि कौन सा पत्रकार 'अच्छा' है और कौन 'बुरा'। अन्ना आंदोलन से शुरू हुई यह प्रवृत्ति गलत है।
प्रतीक सिन्हा (ऑल्ट न्यूज़)जवाबदेही की मांग: सिर्फ 'मेहनती' होना काफी नहीं है। अगर आप किसी जहरीले या सत्ता-परस्त प्रचार तंत्र (Propaganda) का हिस्सा बनते हैं, तो आप आलोचना से बच नहीं सकते।
अभिसार शर्माशेखर गुप्ता पर पलटवार: स्वतंत्र पत्रकारों पर सरकार के दमन के वक्त शेखर गुप्ता चुप क्यों रहते हैं? सत्ता परस्त और स्वतंत्र मीडिया के बीच फर्क करना ही होगा।
मौसमी सिंह (आज तक)सुरक्षा सर्वोपरि: शबरीमाला और किसान आंदोलन का हवाला देते हुए कहा कि पत्रकारों के खिलाफ किसी भी तरह की शारीरिक या मौखिक हिंसा को सही नहीं ठहराया जा सकता।
तवलीन सिंह (वरिष्ठ लेखिका)टीवी मीडिया पर शर्म: मौजूदा टीवी न्यूज़ चैनलों को स्वतंत्र होने का दावा छोड़कर खुद को 'दूरदर्शन 2.0' घोषित कर देना चाहिए।

प्रतीक सिन्हा और अभिनंदन सिकरी का कड़ा प्रहार

ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने विजेता सिंह के 'मेहनती रिपोर्टर' वाले तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने तीखा तंज कसते हुए कहा कि एक पुलिस कॉन्स्टेबल भी कड़ी मेहनत करता है, लेकिन लाठीचार्ज करने पर उससे सवाल पूछे जाते हैं। जो पत्रकार अपनी मर्जी से निरंकुश सरकार का भोंपू बनने वाले संस्थानों में काम चुनते हैं, उन्हें जनता के गुस्से का सामना करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

वहीं, न्यूज़ लॉन्ड्री के अभिनंदन सिकरी ने जंतर-मंतर पर मौजूद मुख्यधारा के मीडिया कर्मियों को "गैर-पत्रकारीय गुंडे" तक कह डाला, जो वहां केवल प्रदर्शन को बदनाम करने के मकसद से गए थे।

बेबाक24 टेक: क्या भारतीय मीडिया अपना सम्मान खो चुका है?

पत्रकारों का सोशल मीडिया पर इस तरह एक-दूसरे से भिड़ना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारतीय मीडिया अब निष्पक्षता के बजाय 'प्रो-गवर्नमेंट' और 'एंटी-गवर्नमेंट' के खेमों में बुरी तरह बंट चुका है।

बेबाक24 का विश्लेषण कहता है कि जंतर-मंतर पर पत्रकारों के खिलाफ हुआ यह बर्ताव कोई रातों-रात उपजा गुस्सा नहीं है। पिछले कुछ सालों में मुख्यधारा के मीडिया ने जिस तरह से हर बड़े जन-आंदोलन (चाहे वह किसान आंदोलन हो या सीजेपी का छात्र आंदोलन) को बदनाम करने की कोशिश की है, यह उसी की प्रतिक्रिया है। शॉर्ट पोस्ट के एबी रवि के मुताबिक, जब से सत्ता ने मीडिया की पहुंच को सीमित किया है, तब से पत्रकारिता का स्तर गिरकर पीआर एजेंसी जैसा हो गया है। हालांकि, किसी भी सूरत में फील्ड में काम कर रहे पत्रकारों पर हिंसा या बदसलूकी को जायज नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन टीवी चैनलों को भी यह समझना होगा कि वे जनता का भरोसा तेजी से खो रहे हैं।



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