by on | 2026-07-18 19:23:15
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कोलकाता: नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट परिसर के भीतर स्थित ऐतिहासिक बांकड़ा मस्जिद में नमाज़ पर रोक लगाए जाने के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति और कूटनीतिक हलकों में उबाल आ गया है। अंतरराष्ट्रीय विमानन सुरक्षा नियमों का हवाला देते हुए एयरपोर्ट अथॉरिटी और सीआईएसएफ ने मस्जिद में प्रवेश पूरी तरह बंद कर दिया है, जिसे लेकर तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के नेता आमने-सामने आ गए हैं।
कोलकाता एयरपोर्ट प्रशासन की ओर से जारी आधिकारिक बयान में इस पाबंदी के पीछे अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों का हवाला दिया गया है।
एयरपोर्ट अथॉरिटी का पक्ष: "अंतरराष्ट्रीय नियमों के मुताबिक, किसी भी चालू रनवे के 240 मीटर के दायरे में कोई भी बाहरी ढांचा या कंस्ट्रक्शन नहीं होना चाहिए। बांकड़ा एयरपोर्ट मस्जिद रनवे से महज़ 165 मीटर की दूरी पर स्थित है, जो हवाई जहाजों की लैंडिंग, टेक-ऑफ और एयरपोर्ट की आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील और जोखिम भरा है।"
एयरपोर्ट की सुरक्षा का जिम्मा संभाल रही केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल पहले ही इस मस्जिद की अवस्थिति पर सुरक्षा आपत्ति जता चुकी थी। सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत, पहले इस मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के लिए जैसोर रोड के गेट नंबर 8 से कड़े पहचान पत्र सत्यापन के बाद केवल 20 लोगों को ही सीआईएसएफ की कड़ी निगरानी में बस से ले जाया जाता था, लेकिन अब इस पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है।
कोलकाता के स्थानीय इतिहासकारों और जानकारों के मुताबिक, इस मस्जिद का इतिहास कोलकाता एयरपोर्ट से भी काफी पुराना है:
स्थापना वर्ष 1890: इस मस्जिद का निर्माण साल 1890 में अविभाजित बंगाल के दौरान स्थानीय ग्रामीणों के चंदे और सहयोग से हुआ था।
एयरपोर्ट से पहले का वजूद: कोलकाता एयरपोर्ट की स्थापना साल 1924 में हुई थी, यानी एयरपोर्ट बनने से 34 साल पहले ही यह मस्जिद वहां मौजूद थी।
गौरीपुर जामे मस्जिद: शुरुआत में इस मस्जिद का नाम 'गौरीपुर जामे मस्जिद' था, जिसे बाद में बदलकर 'बांकड़ा एयरपोर्ट मस्जिद' कर दिया गया। एक दौर में अविभाजित बंगाल के सातखीरा (जो अब बांग्लादेश में है) और आसपास के कई गांवों के लोग यहाँ नमाज़ अदा करने आते थे। सरकारी भूमि और राजस्व रिकॉर्ड में भी पिछले 71 सालों से इस मस्जिद का नाम बाकायदा दर्ज है।
मस्जिद में एंट्री बंद होने और रनवे विस्तार के लिए इसे शिफ्ट करने की खबरों पर बंगाल के सियासी दिग्गजों ने अपनी-अपनी राय रखी है:
टीएमसी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद सौगत रॉय ने इस कार्रवाई की कड़े शब्दों में निंदा की है। उन्होंने कहा, "यह लोगों की आस्था पर सीधा हमला है। यह मस्जिद 136 साल पुरानी है और विमान तो पहले भी उड़ रहे थे। अगर सुरक्षा कारणों से मस्जिद को हटाना भी है, तो तानाशाही के बजाय स्थानीय लोगों और मस्जिद कमेटी की सहमति से इसे दूसरी जगह शिफ्ट किया जाना चाहिए।"
पश्चिम बंगाल जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष और पूर्व मंत्री सिद्दिक़ुल्लाह चौधरी ने नाराजगी जताते हुए कहा, "हम पिछले 30 साल से कह रहे हैं कि हमारे साथ बैठकर बात कीजिए। ताक़त के बल पर अचानक नमाज़ बंद करना गलत है। बांकड़ा गांव के लोगों ने कभी कानून नहीं तोड़ा।" मस्जिद समिति के महासचिव मोहम्मद ज़मीरुददीन ने भी शिकायत की कि प्रवेश बंद करने से पहले उन्हें कोई औपचारिक नोटिस नहीं दिया गया, जबकि वे वार्ता के लिए तैयार थे।
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इस फैसले का खुलकर समर्थन किया है। मुख्यमंत्री का साफ कहना है कि सरकार किसी की धार्मिक स्वतंत्रता में दखल नहीं दे रही है, लेकिन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हवाई सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
वहीं, राज्य के मंत्री और बीजेपी नेता दिलीप घोष ने अयोध्या का उदाहरण देते हुए कहा, "आस्था अपनी जगह ठीक है, लेकिन दुनिया के किसी भी आधुनिक एयरपोर्ट के अंदर इस तरह का कंस्ट्रक्शन नहीं होता। रनवे को बड़ा करने और कोलकाता एयरपोर्ट की क्षमता बढ़ाने के लिए मस्जिद को वहां से हटाकर दूसरी जगह शिफ्ट किया जाएगा।" बीजेपी नेता तथागत रॉय और स्थानीय विधायक सौरभ सिकदार ने भी इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे देश की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम बताया।
कोलकाता एयरपोर्ट की बांकड़ा मस्जिद का मामला आस्था, इतिहास और आधुनिक बुनियादी ढांचे व सुरक्षा के बीच टकराव का एक क्लासिक उदाहरण है। यह सच है कि मस्जिद का इतिहास हवाई अड्डे से पुराना है, लेकिन इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि आज के दौर में अंतरराष्ट्रीय विमानन सुरक्षा नियम बेहद कड़े हैं और 165 मीटर की दूरी किसी भी बड़े विमान हादसे के समय आत्मघाती साबित हो सकती है।
बेबाक24 का मानना है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर प्रशासनिक हठधर्मिता या राजनीतिक रोटियां सेकने के बजाय बीच का रास्ता निकाला जाना चाहिए। चूंकि एयरपोर्ट अथॉरिटी पहले ही मस्जिद के लिए वैकल्पिक जमीन देने का भरोसा दे चुकी है, इसलिए टीएमसी और मुस्लिम संगठनों को सुरक्षा की अहमियत समझनी चाहिए, और वहीं केंद्र सरकार व प्रशासन को बल प्रयोग करने के बजाय मस्जिद कमेटी को विश्वास में लेकर, पूरे सम्मान के साथ इस ऐतिहासिक ढांचे को पुनर्स्थापित करना चाहिए। सुरक्षा और सौहार्द दोनों ही देश के लिए समान रूप से जरूरी हैं।
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