by on | 2026-07-17 21:47:02
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लेह/नई दिल्ली (बेबाक24): दिल्ली के जंतर-मंतर पर देश की शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग को लेकर २० दिनों से आमरण अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। ९ किलोग्राम वजन घट जाने के बाद भी उनका हौसला डिगा नहीं है। अधिकांश लोग उन्हें केवल एक आंदोलनकारी या शिक्षाविद् के रूप में देखते हैं, लेकिन वास्तव में वे एक असाधारण मैकेनिकल इंजीनियर, इनोवेटर और पर्यावरण योद्धा हैं, जिन्होंने लद्दाख जैसे दुर्गम क्षेत्र की भौगोलिक चुनौतियों को ही अपनी ताकत बना दिया।
सोनम वांगचुक का मानना है कि शिक्षा और विज्ञान का असली उद्देश्य समाज की व्यावहारिक समस्याओं को हल करना होना चाहिए। उन्होंने अपने जीवन में इसे चरितार्थ करते हुए कई अद्भुत आविष्कार किए:
लद्दाख के ऊंचे और शुष्क क्षेत्रों में सर्दियों में पानी बहकर बर्बाद हो जाता था, जबकि गर्मियों में बोआई के समय पानी की भारी किल्लत होती थी। वांगचुक ने इस समस्या से निपटने के लिए 'आइस स्तूप' तकनीक विकसित की।
यह शंकु (cone) के आकार के कृत्रिम बर्फ के पहाड़ होते हैं, जो सर्दियों के पानी को जमा रखते हैं।
गर्मियों में जब तापमान बढ़ता है, तो ये धीरे-धीरे पिघलकर खेती और सिंचाई के लिए अमूल्य पानी उपलब्ध कराते हैं।
लद्दाख की कड़कड़ाती सर्दियों में जब बाहर का तापमान शून्य से १५ डिग्री सेल्सियस नीचे (-१५°C) चला जाता है, तब वांगचुक द्वारा मिट्टी और स्थानीय सामग्री से तैयार किए गए विशेष सौर-ऊर्जा संचालित कमरों के भीतर का तापमान १५ डिग्री सेल्सियस (+१५°C) बना रहता है।
इन कमरों को बनाने में बेहद कम लागत आती है।
भारतीय सेना के साथ साझेदारी में चीन सीमा पर तैनात सैनिकों के तंबू और कैंपों को गर्म रखने के लिए भी इस तकनीक का उपयोग किया जा रहा है, जिसे अब अफगानिस्तान तक ले जाया गया है।
सोनम वांगचुक ने पारंपरिक और रटने वाली शिक्षा पद्धति को चुनौती देते हुए व्यावहारिक कौशल पर ध्यान केंद्रित किया:
सेकमोल (SECMOL - 1988): 'स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख' की स्थापना उन्होंने युवाओं में आत्मविश्वास और जीवन जीने के कौशल (लाइफ स्किल्स) विकसित करने के लिए की थी।
फेल होने वाले बच्चों के लिए विशेष स्कूल: सेकमोल अल्टरनेटिव स्कूल की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि इसमें प्रवेश का एकमात्र मानदंड परीक्षा में 'अनुत्तीर्ण' (फेल) होना है। यहां बच्चों को व्यावहारिक विज्ञान, सौर ऊर्जा और पर्यावरण के अनुकूल तकनीकें सिखाई जाती हैं।
हयाल (HIAL): अपने इस मिशन को उच्च शिक्षा तक ले जाने के लिए उन्होंने 'हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स लद्दाख' की स्थापना की, जहां नवाचारों को व्यावसायिक और व्यावहारिक स्तर पर आगे बढ़ाया जाता है।
ऑपरेशन न्यू होप: सरकारी स्कूलों के ढांचे और पाठ्यक्रम को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने और शिक्षकों को बाल-अनुकूल प्रशिक्षण देने के लिए उन्होंने इस त्रिपक्षीय (सरकार, समुदाय और नागरिक समाज) आंदोलन का नेतृत्व किया।
सोनम वांगचुक का व्यक्तिगत जीवन उनके आविष्कारों से भी अधिक संघर्षपूर्ण और जादुई रहा है:
9 साल की उम्र तक नहीं देखा स्कूल का मुंह: 1988 में लेह के उलेटोक्पो गांव में जन्मे सोनम ने 9 वर्ष की आयु तक औपचारिक स्कूल का चेहरा नहीं देखा था। उनकी मां ने उन्हें घर पर ही स्थानीय भाषा और व्यावहारिक अनुभवों से शुरुआती शिक्षा दी। वांगचुक मानते हैं कि स्कूल न जाने के कारण ही वे लीक से हटकर सोचना सीख पाए।
श्रीनगर से दिल्ली भाग आना: जब उन्हें ९ साल की उम्र के बाद श्रीनगर के स्कूल भेजा गया, तो भाषा की समस्या के कारण शिक्षक उन्हें कक्षा से बाहर खड़ा कर देते थे। इस मानसिक प्रताड़ना से तंग आकर १२ वर्ष की आयु में वे अकेले बस पकड़कर दिल्ली आ गए और विशेष केंद्रीय विद्यालय के प्रधानाचार्य के कक्ष में सीधे जाकर अपनी हिम्मत के बल पर दाखिला लिया।
पिता ने रोका खर्च, तो ट्यूशन से जुटाई फीस: जब उन्होंने श्रीनगर के इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया, तो उनके पिता (जो जम्मू-कश्मीर सरकार में मंत्री थे) चाहते थे कि वे सिविल इंजीनियरिंग पढ़ें, जबकि सोनम की रुचि मैकेनिकल में थी। पिता द्वारा पढ़ाई का खर्च रोकने पर १९ वर्ष की आयु में सोनम ने स्कूली बच्चों को कोचिंग देना शुरू किया। उन्होंने मात्र दो महीनों में ही अपने पूरे तीन साल की इंजीनियरिंग की फीस खुद कमाकर जुटा ली।
| महत्वपूर्ण वर्ष/सम्मान | ऐतिहासिक पड़ाव और कार्य |
| वर्ष 1988 | लद्दाख में क्रांतिकारी व्यावहारिक शिक्षा के लिए सेकमोल (SECMOL) की स्थापना। |
| वर्ष 2025 | एशिया का सर्वोच्च पुरस्कार 'रेमन मैग्सेसे पुरस्कार' प्रदान किया गया। |
| अक्तूबर 2024 | लद्दाख को छठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए लेह से दिल्ली तक ऐतिहासिक पैदल मार्च। |
| जून 2026 | परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर बेमियादी अनशन की शुरुआत। |
सोनम वांगचुक का जीवन इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि सच्चा वैज्ञानिक या इंजीनियर वह नहीं है जिसके पास केवल बड़ी डिग्रियां हों, बल्कि वह है जो अपनी बुद्धि और आविष्कारों से समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति के जीवन को आसान बना सके। आइस स्तूप से लेकर बिना हीटर के शून्य से नीचे के तापमान में रहने वाले घरों तक, उनके हर आविष्कार ने लद्दाख की विषम परिस्थितियों को जीवन के अनुकूल बनाया है।
बेबाक24 का मानना है कि ऐसे अद्वितीय और देश को वैश्विक पहचान दिलाने वाले इनोवेटर को अपनी जायज मांगों को सुनाने के लिए दिल्ली की सड़कों पर इस कड़कड़ाती धूप और बारिश के बीच २० दिनों तक भूखा बैठना पड़े, यह देश की प्रशासनिक संवेदनशीलता पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। सरकार को उनके वैज्ञानिक योगदान का सम्मान करते हुए उनकी मांगों पर तुरंत विचार करना चाहिए।
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