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2025 बिहार चुनाव: एनडीए की 'सुनामी' और महागठबंधन का 'अकेला खड़ाव'

by admin@gmail.com on | 2025-11-15 19:29:22

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2025 बिहार चुनाव: एनडीए की 'सुनामी' और महागठबंधन का 'अकेला खड़ाव'

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के परिणाम न सिर्फ सीटों के मामले में, बल्कि वोट शेयर के गणित में भी एक बड़ी खाई को दर्शाते हैं। जहाँ 2020 के चुनाव में दोनों प्रमुख गठबंधनों के बीच अंतर बेहद कम था, वहीं इस बार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने एक निर्णायक बढ़त हासिल की, जिससे महागठबंधन को करारी शिकस्त मिली।

2020 से 2025 तक: खाई में बदलता मामूली अंतर

2020 के पिछले विधानसभा चुनाव में, सीटों का अंतर भले ही कम रहा हो (NDA को 125, महागठबंधन को 110 के आसपास), लेकिन वोट शेयर का अंतर बेहद मामूली था, सिर्फ 0.03 प्रतिशत। यह दिखाता था कि दोनों धड़े लगभग बराबरी की टक्कर दे रहे थे।

हालाँकि, 2025 में यह नजदीकी मुकाबला पूरी तरह से एकतरफा हो गया।

| गठबंधन | 2025 वोट शेयर | 2025 सीटें | अंतर (लगभग) |

|---|---|---|---|

| NDA | 46.6% | 202+ (प्रचंड जीत) | +8.7% |

| महागठबंधन | 37.9% | 35 (भारी हार) |  

इस बार एनडीए ने अपना वोट शेयर बढ़ाकर 46.6 प्रतिशत तक पहुँचा दिया, जो पिछले चुनाव से एक बड़ी छलांग है। वहीं, महागठबंधन 37.9 प्रतिशत के आसपास ही अटका रहा। यह लगभग 10 प्रतिशत का विशाल अंतर है, जो चुनावी परिणामों को पूरी तरह से एनडीए के पक्ष में झुकाने के लिए पर्याप्त था।

एनडीए की रणनीति: सफल वोट ट्रांसफर का मंत्र

एनडीए की सबसे बड़ी सफलता वोटों को एक-दूसरे के दलों में सफलतापूर्वक ट्रांसफर करने की क्षमता में रही।

 * भाजपा का बढ़ता दबदबा: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और भाजपा के आक्रामक चुनाव प्रचार ने पार्टी को सबसे बड़े वोट शेयर और स्ट्राइक रेट के साथ सामने खड़ा किया।

 * गठबंधन की ताकत: भाजपा, जदयू, लोजपा (रामविलास), हम और आरएलएम जैसे एनडीए के सहयोगी दलों ने न सिर्फ अपने-अपने कोर वोटबैंक को एकजुट रखा, बल्कि उसे गठबंधन के अन्य उम्मीदवारों की तरफ मोड़ने में भी कामयाबी हासिल की। यह 'डबल इंजन' की अपील को ज़मीन पर उतारने में सफल रहा।

महागठबंधन की चूक: 'खड़ा हूँ आज भी वहीं'

महागठबंधन, जिसके केंद्र में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) था, इस चुनाव में 'खड़ा हूँ आज भी वहीं' की तर्ज पर 2020 के वोट शेयर के आसपास ही अटका रहा।

 * सहयोगियों का कमज़ोर साथ: राजद को अपने सहयोगियों—कांग्रेस, वीआईपी और वामपंथी दलों—का अपेक्षित साथ नहीं मिला।

   * कांग्रेस की निराशाजनक परफॉर्मेंस: कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद कमज़ोर रहा, जो महागठबंधन के कुल वोट शेयर को खींचने वाला सबसे बड़ा कारण बना।

   * वीआईपी और वाम दलों का सीमित प्रभाव: वीआईपी और वामपंथी दल भी उन सीटों पर राजद के वोटों को अपनी तरफ खींचने या एनडीए के वोटों में सेंध लगाने में सफल नहीं हो पाए, जहाँ गठबंधन ने उन्हें उतारा था।

 * एंकरिंग की समस्या: जहाँ एनडीए का गठबंधन "मोदी फैक्टर" के इर्द-गिर्द मजबूती से बंधा था, वहीं महागठबंधन अपनी युवा अपील को वोटों में बदलने और अपने पारंपरिक वोटबैंक (M-Y समीकरण) में सहयोगियों के वोटों को जोड़ने में विफल रहा।

संक्षेप में, 2025 का बिहार चुनाव वोट शेयर के इस बड़े अंतर के साथ यह स्पष्ट संदेश देता है कि एनडीए एक cohesive (सुसंगत) इकाई के रूप में लड़ा, जबकि महागठबंधन असंतुलित और बिखरा हुआ महसूस हुआ, जिसकी कीमत उसे चुनावी हार के रूप में चुकानी पड़ी।



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