by on | 2026-06-03 00:31:40
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वाराणसी। वक्त बदला, मिजाज बदला और अब काशी की रवायत भी बदल रही है। जिस शहर को उसकी 'अल्हड़ता' और 'ठहराव' के लिए जाना जाता था, आज वह 'गतिशीलता' और 'स्मार्टनेस' की अंधी दौड़ में अपनी ही तारीख (इतिहास) को मलबे में तब्दील होते देख रहा है।
मंगलवार की सर्द आधी रात को राजघाट इलाके में जो कुछ हुआ, वह सिर्फ एक निर्माण को ढहाना नहीं था, बल्कि विकास के नाम पर इतिहास के एक पन्ने को हमेशा के लिए फाड़ देना था। भारी सुरक्षा बल और गरजते बुलडोजरों के साए में करीब 200 साल पुरानी 'अजगैब शहीद मस्जिद' को जमींदोज कर दिया गया।
कार्रवाई इतनी गोपनीय और अचानक थी कि स्थानीय लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। प्रशासन को शायद अंदाजा था कि 200 साल पुरानी विरासत पर जब वार होगा, तो दर्द लाजमी है। इसी 'दर्द' को दबाने के लिए राजघाट को छावनी बना दिया गया।
जेसीपी शिवहरी मीणा, डीसीपी काशी गौरव बंसवाल और एडीसीपी वैभव बांगर समेत आला अधिकारी रातभर मौके पर डटे रहे। प्रशासनिक भाषा में इसे "शांति व्यवस्था बनाए रखना" कहते हैं, लेकिन बेबाक शब्दों में यह जनता के संभावित आक्रोश को सत्ता के बल पर दबाने की मुकम्मल तैयारी थी।
प्रशासन का साफ तर्क है कि यह कार्रवाई प्रस्तावित मॉडल स्टेशन परियोजना के तहत की गई है। काशी को आधुनिक बनाना है, रेलवे का कायाकल्प करना है, तो रास्ते के रोड़े हटाने होंगे। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या आधुनिकता की हर पटरी, इतिहास की छाती को चीरकर ही गुजरेगी?
बेबाक नजरिया:
"स्मार्ट सिटी" और "गतिशील काशी" के इस भव्य नैरेटिव के पीछे एक कड़वा सच यह भी है कि हम अपनी पहचान खो रहे हैं। अजगैब शहीद मस्जिद जैसी कयी ऐतिहासिक कृतियां, जो सदियों से इस शहर के ताने-बाने का हिस्सा थीं, वे आज कागजी नक्शों पर सिर्फ 'अतिक्रमण' या 'बाधा' बनकर रह गई हैं।
फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है। इलाका शांत है—या शायद खामोश कर दिया गया है। प्रशासन अपनी पीठ थपथपा सकता है कि बिना किसी बड़े विरोध के इतनी बड़ी कार्रवाई पूरी हो गई। लेकिन यह सोचना जरूरी है कि जब-जब कोई ऐतिहासिक कृति इस तरह मिटाई जाती है, तब-तब शहर की आत्मा का एक हिस्सा हमेशा के लिए मर जाता है।
गतिशीलता जरूरी है, रफ्तार की जरूरत से इनकार नहीं है, लेकिन अगर रफ्तार अपने पीछे इतिहास का मलबा छोड़ जाए, तो आने वाली नस्लें 'स्मार्ट' तो बन जाएंगी, मगर अपनी 'जड़ों' से महरूम रहेंगी।
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