by on | 2026-06-03 00:20:06
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‘लखनऊ/वाराणसी। उत्तर प्रदेश की राजनीति में २ जून १९९५ का वह ‘काला अध्याय’ एक बार फिर सियासी गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक तैरने लगा है। लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस कांड की ३१वीं बरसी पर उत्तर प्रदेश विधान परिषद सदस्य और वरिष्ठ नेता लालजी निर्मल के एक तीखे बयान ने सूबे का सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। लालजी निर्मल ने इस घटना को आज़ाद भारत में 'महिला उत्पीड़न की सबसे बड़ी मिसाल' बताते हुए समाजवादी कुनबे को सीधे कठघरे में खड़ा कर दिया है।
बेबाक २४ की विशेष रिपोर्ट में पढ़िए कि आख़िर तीन दशक बाद भी क्यों यह मुद्दा यूपी की सियासत को सुलगाने का माद्दा रखता है।
विधान परिषद सदस्य लालजी निर्मल ने २ जून की इस बर्बर घटना को याद करते हुए कहा कि जो कुछ भी उस दिन लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस में हुआ, वह कोई सामान्य राजनीतिक टकराव नहीं था। वह साजिशन एक महिला नेता के सम्मान, अस्मिता और लोकतांत्रिक मूल्यों को तार-तार करने की कोशिश थी।
"राजनीति में मतभेद होना लोकतंत्र की खूबसूरती है, लेकिन सत्ता की हनक में किसी महिला नेता पर जानलेवा हमला करना, उन्हें डराना-धमकाना कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता। २ जून १९९५ की घटना पूरे समाज के लिए आज भी एक शर्मनाक धब्बा है और इसकी हमेशा निंदा होनी चाहिए।"
— लालजी निर्मल, MLC
नब्बे के दशक में यूपी की राजनीति में 'मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए...' के नारे के साथ सपा-बसपा की सरकार बनी थी, लेकिन आपसी अंतर्विरोधों के कारण यह दोस्ती ज़्यादा दिन नहीं चली। २ जून १९९५ को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार से समर्थन वापस लेने का ऐलान कर दिया। इसी सियासी उठापटक के बीच जो हुआ, उसने देश की राजनीति को हिलाकर रख दिया:
इस खौफनाक हादसे ने यूपी की सामाजिक और राजनीतिक इंजीनियरिंग को हमेशा-अभिशप्त दरार दे दी। इस घटना के ठीक अगले दिन यानी ३ जून १९९५ को मायावती ने भाजपा के बाहरी समर्थन से पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
२ जून की बरसी पर सोशल मीडिया पर #GuestHouseKand ट्रेंड करता रहा। बसपा समर्थकों ने इसे दलित और महिला अस्मिता से जोड़कर पुरानी तस्वीरों और वीडियो को साझा किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लालजी निर्मल का यह बयान महज़ एक याद दिलाना नहीं है, बल्कि आगामी राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए विपक्ष (खासकर सपा) की घेराबंदी का एक सोचा-समझा सियासी दांव भी है।
बेबाक टिप्पणी:
सियासत में शह और मात के खेल चलते रहेंगे, सरकारें आएंगी और जाएंगी। लेकिन तीन दशक बाद भी 'गेस्ट हाउस कांड' का जिंदा रहना यह याद दिलाता है कि जब राजनीति वैचारिक धरातल को छोड़कर व्यक्तिगत दुश्मनी और हिंसा पर आमादा हो जाती है, तो नुकसान किसी दल का नहीं, बल्कि देश के संविधान और लोकतांत्रिक मर्यादा का होता है।
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