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कचहरी परिसर में हरा-भरा पीपल का वृक्ष काटे जाने से आक्रोश, प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल

by on | 2026-06-02 12:57:52

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कचहरी परिसर में हरा-भरा पीपल का वृक्ष काटे जाने से आक्रोश, प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल


गाजीपुर।

जिला मुख्यालय स्थित कचहरी परिसर में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) शाखा के समीप स्थित एक दशकों पुराने और पूरी तरह से हरे-भरे पीपल के वृक्ष को काटे जाने का गंभीर मामला प्रकाश में आया है। अत्यंत संवेदनशील और वीवीआईपी क्षेत्र माने जाने वाले कलेक्ट्रेट व कचहरी परिसर में न्याय की नाक के नीचे हुई इस कटाई को लेकर स्थानीय अधिवक्ताओं, वादकारियों और पर्यावरण प्रेमियों में गहरा असंतोष है। हैरान करने वाली बात यह है कि मुख्यालय पर सरेआम हो रहे इस कृत्य पर संबंधित प्रशासनिक अधिकारी और वन विभाग पूरी तरह मौन साधे हुए हैं।

​न्याय की चौखट पर पर्यावरण नियमों की अनदेखी

​कचहरी परिसर में प्रतिदिन हजारों की संख्या में वादकारी, अधिवक्ता और आम नागरिक अपने कानूनी व प्रशासनिक कार्यों के लिए आते हैं। भारतीय स्टेट बैंक के समीप स्थित यह विशाल पीपल का वृक्ष भीषण ग्रीष्मकाल में यहां आने वाले लोगों के लिए छांव और शीतलता का मुख्य सहारा था। वैश्विक स्तर पर बढ़ते तापमान और पर्यावरण संरक्षण की सरकारी अपीलों के बीच, इस तरह के एक स्वस्थ, दीर्घायु और धार्मिक रूप से पूजनीय वृक्ष पर कुल्हाड़ी चलाया जाना क्षेत्र में चर्चा और निंदा का विषय बना हुआ है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस कटाई के पीछे किसी रसूखदार लॉबी का हाथ हो सकता है, जिसके दबाव में तंत्र मूकदर्शक बना रहा।

​वन संरक्षण अधिनियम के उल्लंघन की आशंका

​उत्तर प्रदेश में पर्यावरण और वन संरक्षण के कड़े नियम लागू हैं, जिसके तहत किसी भी हरे-भरे वृक्ष, विशेषकर पीपल, बरगद और नीम जैसी प्रतिबंधित श्रेणियों को काटने के लिए वन विभाग की लिखित अनुमति और ठोस कारण की आवश्यकता होती है। जिला मुख्यालय जैसी अति-सुरक्षित जगह पर बिना किसी पूर्व सूचना या स्पष्ट वैधानिक आदेश के इस विशालकाय पेड़ को काटना सीधे तौर पर नियमों को चुनौती देने जैसा है।

​इस घटना ने प्रशासनिक सतर्कता पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:

  • ​क्या इस प्रतिबंधित और पूरी तरह स्वस्थ वृक्ष को हटाने के लिए वन विभाग से कोई आधिकारिक अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) अथवा अनुमति ली गई थी?
  • ​यदि यह कटाई अवैध थी, तो जिला प्रशासन और कलेक्ट्रेट की सुरक्षा व निगरानी में तैनात अमला घंटों चली इस प्रक्रिया से अनजान कैसे बना रहा?

​पर्यावरणविदों और जनता में गहरा रोष

​एक तरफ जहां शासन-प्रशासन की ओर से प्रतिवर्ष करोड़ों की लागत से वृहद वृक्षारोपण अभियान चलाकर पर्यावरण संतुलित करने के दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक नाक के ठीक नीचे स्थापित प्राकृतिक धरोहरों को इस तरह नष्ट किया जाना व्यवस्था की कथनी और करनी में अंतर को स्पष्ट करता है।

​जागरूक नागरिकों और वकीलों ने जिला प्रशासन तथा प्रभागीय वनाधिकारी (DFO) से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। आम जनता का कहना है कि इस अवैध कटाई की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, कटाई का आदेश देने वाले और इसे अंजाम देने वाले दोषियों को चिन्हित कर उनके खिलाफ पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत कठोर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।



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