by on | 2026-05-30 21:45:00
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संतोष राय
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30 मई 1826 को जब पंडित जुगलकिशोर शुक्ल ने कलकत्ता से 'उदन्त मार्तण्ड' का पहला अंक निकाला होगा, तब उन्होंने शायद ही सोचा होगा कि जिस पौधे को वे रोप रहे हैं, वह दो सदियों बाद इतना विशाल और जटिल वटवृक्ष बन जाएगा। आज हिंदी पत्रकारिता अपने गौरवशाली इतिहास के 200 वर्षों के मुहाने पर खड़ी है। यह समय उसकी अद्भुत यात्रा के उत्सव का भी है और आत्ममंथन का भी।
हिंदी पत्रकारिता का जन्म सिर्फ सूचनाएं देने के लिए नहीं, बल्कि देश को जगाने के लिए हुआ था। भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी और अज्ञेय जैसे नामचीन मनीषियों ने पत्रकारिता को 'मिशन' माना। उस दौर में कलम की ताकत से हुकूमतें कांपती थीं। संपादक का एक लेख समाज की दिशा बदल देता था। वह हिंदी पत्रकारिता का स्वर्णिम और वैभवशाली दौर था, जहाँ साख ही सबसे बड़ी पूंजी थी।
वक्त बदला और तकनीक भी। जो पत्रकारिता कभी लकड़ी के छापों और धीमी रफ्तार वाले प्रिंटिंग प्रेस से शुरू हुई थी, उसने लंबा सफर तय किया।
आज जब हम 200 साल की उपलब्धियों का मूल्यांकन करते हैं, तो वर्तमान की कुछ कड़वी हकीकतों से आंखें नहीं मूंद सकते। आज मीडिया पर कॉरपोरेट घरानों का नियंत्रण बढ़ता जा रहा है। पत्रकारिता जब 'मिशन' से 'बिजनेस मॉडल' बनती है, तो प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। मुनाफे की इस अंधी दौड़ ने खबरों की निष्पक्षता को चोट पहुंचाई है।
यही वजह है कि आज भारतीय मीडिया पर 'गोदी मीडिया' होने के गंभीर आरोप विपक्ष और समाज के एक बड़े हिस्से द्वारा लगाए जा रहे हैं। जब मीडिया सत्ता से तीखे सवाल पूछने के बजाय विपक्ष से ही सवाल करने लगे या सत्ता की ढाल बन जाए, तो उसकी साख पर संकट आना लाजिमी है। आज बहसें मुद्दों पर नहीं, बल्कि ध्रुवीकरण और टीआरपी के लिए होती हैं।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे ज्यादा नुकसान उस सच्चे कलमकार (पत्रकार) का हो रहा है, जो अपनी साख और मूल्यों को बचाना चाहता है। आज मीडिया संस्थानों की व्यावसायिक मजबूरियों और एक पत्रकार की अंतरात्मा के बीच गहरा द्वंद्व चल रहा है।
"नौकरी बचाएं या सच दिखाएं?" — यह आज के दौर के ईमानदार पत्रकार का सबसे बड़ा संकट है।
कई बेबाक कलमकारों को संस्थानों से बाहर का रास्ता देखना पड़ा, तो कइयों ने सोशल मीडिया को अपना नया ठिकाना बना लिया। लेकिन वहाँ भी एल्गोरिदम और व्यूज की अपनी मजबूरियाँ हैं।
हिंदी पत्रकारिता ने अपने 200 सालों में आज़ादी की लड़ाई से लेकर आधुनिक भारत के निर्माण तक एक अविश्वसनीय भूमिका निभाई है। इसकी ताकत आज भी कम नहीं हुई है, इसका विस्तार अभूतपूर्व है। लेकिन इस तकनीकी विस्तार के बीच जो चीज़ खो रही है, वह है 'भरोसा'।
यदि हिंदी पत्रकारिता को अपने अगले सौ सालों का सफर भी उतने ही गौरव के साथ तय करना है, तो उसे कॉरपोरेट के दबाव और सत्ता के मोह से मुक्त होना होगा। कलम को फिर से जनसरोकार की स्याही से भरना होगा। शोर बहुत हो चुका, अब ज़रूरत है कि हिंदी पत्रकारिता फिर से अपनी उस गंभीर और निष्पक्ष आवाज़ को तलाशे, जिसके लिए वह कभी पूजी जाती थी।
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