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24 साल बाद 'टकसाल' के गोलियों की गूंज पर इंसाफ की दस्तक, क्या नदेसर कांड में फंसेंगे अभय सिंह?

by on | 2026-04-10 17:39:14

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24 साल बाद 'टकसाल' के गोलियों की गूंज पर इंसाफ की दस्तक, क्या नदेसर कांड में फंसेंगे अभय सिंह?

वाराणसी: पूर्वांचल की सियासत में 'माननीयों' की अदावत का सबसे खूनी अध्याय अब अपने अंजाम की ओर है। साल 2002 का वह 'नदेसर शूटआउट', जिसने दो दशक तक बनारस से लेकर लखनऊ तक की गलियों में दहशत और चर्चाओं को जिंदा रखा, अब अदालत के फैसले की दहलीज पर खड़ा है। वाराणसी की एमपी-एमएलए कोर्ट में इस हाई-प्रोफाइल केस की सुनवाई अब उस निर्णायक मोड़ पर आ गई है, जहां से किसी की सियासत चमकेगी तो किसी के लिए कानूनी मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

आमने-सामने दो 'बाहुबली', अदालत में हुई सीधी भिड़ंत

​नदेसर के चर्चित टकसाल सिनेमा कांड में इंसाफ की रफ़्तार अब बुलेट ट्रेन जैसी हो गई है। पूर्व सांसद धनंजय सिंह खुद अदालत की चौखट पर पेश होकर अपना पक्ष रख चुके हैं, वहीं दूसरी ओर उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वी और मामले के मुख्य आरोपी अभय सिंह का बयान भी दर्ज हो चुका है। सालों तक तारीखों के खेल में उलझा यह मामला अब 'जजमेंट डे' के करीब है।

फ्लैशबैक: जब गोलियों की तड़तड़ाहट से थर्रा गया था बनारस

​यह कहानी शुरू होती है साल 2002 में, जब कैंट थाना क्षेत्र का नदेसर इलाका जंग के मैदान में तब्दील हो गया था। बोलेरो से उतरे हमलावरों ने तत्कालीन युवा नेता धनंजय सिंह के काफिले पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी थी। इस हमले में धनंजय सिंह, उनके गनर और ड्राइवर समेत चार लोग खून से लथपथ हुए थे। आरोप सीधे अभय सिंह और उनके साथियों पर लगा। 24 साल पहले उठी वह चिंगारी आज भी पूर्वांचल की सियासी फिजाओं में गर्म है।

सोमवार को आ सकता है बड़ा फैसला?

​वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीनाथ त्रिपाठी की मानें तो अब बहस की गुंजाइश खत्म हो चुकी है। साक्ष्य और गवाहों के पन्ने पलट दिए गए हैं। कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुन ली हैं और संकेत मिल रहे हैं कि अगले सोमवार तक इस मामले में अदालत अपना फैसला सुना सकती है या उसे सुरक्षित रख सकती है।

बेबाक नजरिया:

​यह सिर्फ एक कानूनी केस नहीं है, बल्कि पूर्वांचल के 'वर्चस्व की लड़ाई' का क्लाइमेक्स है। एक तरफ धनंजय सिंह हैं जो अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूती से पकड़े हुए हैं, तो दूसरी तरफ अभय सिंह। इस फैसले का असर न सिर्फ इन दो दिग्गजों के राजनीतिक भविष्य पर पड़ेगा, बल्कि यह वाराणसी की कानून व्यवस्था के इतिहास में एक मिसाल भी बनेगा।



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