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19 साल बाद 'इंसाफ' का सन्नाटा: विधायक अभय सिंह समेत सभी आरोपी बरी, ऐशबाग डबल मर्डर केस में पुलिस की थ्योरी ढेर

by on | 2026-03-31 22:56:28

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19 साल बाद 'इंसाफ' का सन्नाटा: विधायक अभय सिंह समेत सभी आरोपी बरी, ऐशबाग डबल मर्डर केस में पुलिस की थ्योरी ढेर

लखनऊ। राजधानी के ऐशबाग को दहला देने वाले 19 साल पुराने चर्चित 'दोहरे हत्याकांड' में न्याय की घड़ी रुकी और नतीजा सिफर रहा। स्पेशल एमपी-एमएलए कोर्ट के न्यायाधीश हरबंश नारायण ने विधायक अभय सिंह समेत सभी आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया है। 2007 से खिंच रही इस कानूनी लड़ाई का अंत 'साक्ष्यों के अभाव' के उसी पुराने जुमले के साथ हुआ, जिसने पुलिसिया तफ्तीश की पोल खोलकर रख दी है।

वर्चस्व की वो खूनी रंजिश (31 मार्च 2007)

​यह कहानी शुरू होती है मार्च 2007 की उस शाम से, जब ऐशबाग इलाका गोलियों की गूँज से थर्रा उठा था। टेंट व्यवसायी शत्रुघ्न सिंह उर्फ छोटू और उनके साथी जितेन्द्र त्रिपाठी की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। पुलिस ने इसे आपसी रंजिश और ठेकेदारी के वर्चस्व का नतीजा बताया था। आरोप था कि बाहुबली अभय सिंह ने जेल के भीतर से मौत की स्क्रिप्ट लिखी और उनके शूटरों ने इसे अंजाम दिया।

कोर्ट में क्यों हारी पुलिस?

​अदालत के फैसले ने अभियोजन पक्ष के दावों को सिरे से खारिज कर दिया। बरी होने वालों में विधायक अभय सिंह के साथ रविन्द्र सिंह उर्फ रज्जु, अजय प्रताप सिंह उर्फ अजय सिपाही और फिरोज अहमद शामिल हैं। कोर्ट के रुख ने साफ कर दिया कि:

  • कमजोर साक्ष्य: अभियोजन पक्ष ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं दे पाया जो आरोपियों को सीधे अपराध से जोड़ सके।
  • जेल का 'कवच': घटना के दिन अभय सिंह खुद जिला कारागार में बंद थे। पुलिस यह साबित करने में नाकाम रही कि जेल की सलाखों के पीछे से साजिश की डोर कैसे हिलाई गई।
  • गवाहों का रुख: लंबे वक्त तक चले ट्रायल के दौरान गवाहों के बयानों और तकनीकी साक्ष्यों में वह दम नहीं दिखा जो दोष सिद्ध कर पाता।

बेबाक टिप्पणी: सवाल तो जिंदा रहेंगे!

​19 साल बाद अदालत ने फाइल तो बंद कर दी, लेकिन सवाल आज भी ऐशबाग की उन गलियों में तैर रहे हैं। अगर अभय सिंह और उनके साथी निर्दोष थे—जैसा कि कोर्ट ने माना है—तो फिर शत्रुघ्न और जितेन्द्र का असली कातिल कौन है?

​क्या पुलिस ने 19 साल तक केवल अंधेरे में तीर चलाए? या फिर कमजोर पैरवी ने कातिलों को 'संदेह का लाभ' की खिड़की दे दी? दो परिवारों ने अपना सब कुछ खो दिया, और सिस्टम ने उन्हें दो दशक तक सिर्फ तारीखें दीं। यह फैसला अपराधियों की जीत है या जांच एजेंसियों की हार, यह समाज को तय करना है।



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