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दवा न डॉक्टर, राम भरोसे व्यवस्था! क्या कागज़ों पर ही तंदुरुस्त है शेरपुर का स्वास्थ्य ढांचा?

by on | 2026-10-04 17:33:34

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दवा न डॉक्टर, राम भरोसे व्यवस्था! क्या कागज़ों पर ही तंदुरुस्त है शेरपुर का स्वास्थ्य ढांचा?

​गाजीपुर: सरकार भले ही हर गांव तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने का दावा करे और विज्ञापनों में चमचमाती प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणालियों के कसीदे पढ़े, लेकिन गाजीपुर के शेरपुर कलां में ज़मीनी हकीकत इन दावों का मुंह चिढ़ा रही है। गांव के न्यू पीएचसी (New PHC) में डॉक्टर के इंतजार में तड़पते मरीज और राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल में पसरा सन्नाटा सरकारी दावों की कलई खोलने के लिए काफी है।

​हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेज़ी से वायरल हो रहा है, जिसमें राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल का फटेहाल नज़ारा साफ देखा जा सकता है—न डॉक्टर का ठिकाना, न दवाइयों का अता-पता! आखिर 25 हजार मतदाताओं वाले इस ऐतिहासिक और बड़े गांव को मूलभूत स्वास्थ्य सेवा के लिए भी अधिकारियों की चौखट पर क्यों रगड़नी पड़ रही है एड़ियां?

​तीन चुभते सवाल, जिनका जवाब गाजीपुर स्वास्थ्य विभाग को देना ही होगा:

​1. कागज़ी हाज़िरी या ज़मीनी मौजूदगी? वेतन जारी करने का आधार क्या?

जब मरीजों का अनुभव यह कहता है कि अस्पताल में डॉक्टर मिलते ही नहीं, तो फिर सवाल उठता है कि डॉक्टर की उपस्थिति प्रमाणित कौन करता है? किस आधार पर सरकारी खजाने से हर महीने वेतन जारी हो रहा है? सीएचसी (CHC) प्रभारी और मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) स्तर से निगरानी का जो दावा किया जाता है, उसकी ज़मीनी हकीकत क्या है? अगर सब कुछ नियमों के तहत चल रहा है, तो फिर अस्पताल का बायोमीट्रिक डेटा, अटेंडेंस रजिस्टर और ओपीडी (OPD) रजिस्टर सार्वजनिक जांच में दूध का दूध और पानी का पानी क्यों नहीं कर देते?

​2. अनुचित लाभ और संरक्षण की बू: जांच से परहेज़ क्यों?

स्थानीय ग्रामीणों के ज़हन में यह सवाल गहरा रहा है कि क्या किसी स्तर पर अनुचित आर्थिक लाभ या प्रशासनिक संरक्षण का खेल चल रहा है? क्या यही वजह है कि लगातार ड्यूटी से गायब रहने के बावजूद ज़िम्मेदारों पर कोई कार्रवाई नहीं होती? अगर सब निष्पक्ष है, तो विभाग एक पारदर्शी और निष्पक्ष जांच कराने से कतरा क्यों रहा है?

​3. जांच से पहले ही सूचना! क्या यह महज़ 'कागज़ी खानापूर्ति' है?

ग्रामीणों ने इस अव्यवस्था के खिलाफ जिलाधिकारी को बाकायदा ज्ञापन सौंपा। जिलाधिकारी ने तुरंत संज्ञान लेते हुए सीएमओ को जांच के निर्देश भी दिए। लेकिन असली पेंच यही फंसता है—क्या जांच पर जाने से पहले ही संबंधित डॉक्टर को सतर्क कर दिया गया? अगर जांच टीम के पहुंचने की खबर पहले ही अस्पताल पहुंच जाए, तो फिर औचक निरीक्षण का औचित्य ही क्या रह जाता है? क्या यह जांच सिर्फ एक पूर्व-नियोजित फॉर्मेलिटी और कागज़ी खानापूर्ति बनकर रह जाएगी?

​जनप्रतिनिधियों का आश्वासन और ग्रामीणों का दर्द

​करीब 25 हजार वोटरों की आबादी वाले गांव में जब लोग अपनी जायज तकलीफ लेकर जनप्रतिनिधियों के पास जाते हैं, तो उन्हें समाधान के नाम पर सिर्फ "आश्वासन की गोली" थमा दी जाती है। विधायक, सांसद और 'डिजिटल शेरपुर' का दावा करने वाली ग्राम प्रधान की गाड़ियां अब इस अस्पताल की दुर्दशा देखने क्यों नहीं रुकतीं?

​शेरपुर कलां के ग्रामीणों की मांग साफ और स्पष्ट है—उन्हें कोई औपचारिक या लीपापोती वाली जांच रिपोर्ट नहीं चाहिए। वे चाहते हैं कि कागजी रिकॉर्ड (अटेंडेंस व ओपीडी) का मौके की वास्तविक स्थिति से सीधे मिलान किया जाए और दोषी अधिकारियों व डॉक्टरों की जवाबदेही तय हो।

​सरकार की बड़ी-बड़ी स्वास्थ्य योजनाओं का ढोल चाहे कितना भी पीटा जाए, लेकिन शेरपुर के ग्रामीणों के लिए असली 'स्वास्थ्य गारंटी' यही होगी कि जब वे बीमारी की हालत में अस्पताल पहुंचे, तो उन्हें स्टैथॉस्कोप थामे डॉक्टर और काउंटर पर दवाइयां मौजूद मिलें।



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