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मोहम्मद अली जौहर कौन थे? जिनके नाम पर आज़म ख़ान ने बनवाई यूनिवर्सिटी

by admin@bebak24.com on | 2026-08-11 15:30:55

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मोहम्मद अली जौहर कौन थे? जिनके नाम पर आज़म ख़ान ने बनवाई यूनिवर्सिटी

रामपुर। उत्तर प्रदेश के रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय को लेकर जारी विवाद के बीच विश्वविद्यालय के नाम को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व मंत्री आज़म ख़ान द्वारा स्थापित इस विश्वविद्यालय का नाम स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर रखा गया है।

हाल में रामपुर विकास प्राधिकरण ने विश्वविद्यालय परिसर की 40 में से 38 इमारतों को गिराने का आदेश दिया था। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस आदेश के खिलाफ अपील की। इसके बाद मुरादाबाद मंडल के आयुक्त ने फिलहाल इस आदेश पर रोक लगा दी है। इसी राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद के बीच यह सवाल फिर चर्चा में है कि आखिर मोहम्मद अली जौहर कौन थे और उनके नाम पर विश्वविद्यालय क्यों बनाया गया?

मोहम्मद अली जौहर ब्रिटिश शासन के दौर में भारतीय राजनीति के प्रभावशाली नेताओं, पत्रकारों और शिक्षाविदों में गिने जाते थे। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों के अध्यक्ष रहे। खिलाफत आंदोलन और स्वतंत्रता आंदोलन में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रामपुर में हुआ था जन्म

मौलाना मोहम्मद अली जौहर का जन्म 1878 में रामपुर में हुआ था। वह ऐसे परिवार से आते थे, जिसमें शिक्षा और सामाजिक जागरूकता को विशेष महत्व दिया जाता था।

कम उम्र में ही उनके पिता का निधन हो गया था। इसके बाद उनकी मां आबादी बानो बेगम, जिन्हें 'बी अम्मा' के नाम से जाना जाता था, ने उनकी शिक्षा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनकी मां ने अपने बेटों की पढ़ाई के लिए अपनी संपत्ति तक गिरवी रख दी थी। मोहम्मद अली जौहर और उनके भाई शौकत अली ने अलीगढ़ के मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की।

इसके बाद मोहम्मद अली जौहर उच्च शिक्षा के लिए ब्रिटेन गए और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के लिंकन कॉलेज में आधुनिक इतिहास का अध्ययन किया।

पढ़ाई के बाद प्रशासनिक सेवा से पत्रकारिता तक

भारत लौटने के बाद जौहर ने रामपुर रियासत में शिक्षा विभाग से जुड़े पद पर काम किया। बाद में उन्होंने बड़ौदा में भी कार्य किया।

हालांकि, उनकी पहचान केवल प्रशासनिक अधिकारी के रूप में नहीं बनी। वह आगे चलकर प्रभावशाली पत्रकार, लेखक और वक्ता के रूप में उभरे।

उन्होंने 14 जनवरी 1911 को कलकत्ता से अंग्रेजी साप्ताहिक समाचार पत्र 'द कॉमरेड' शुरू किया। अखबार ने बहुत कम समय में अपनी अलग पहचान बना ली। बाद में इसे दिल्ली से प्रकाशित किया गया।

इसके बाद 1913 में उन्होंने उर्दू दैनिक 'हमदर्द' की शुरुआत की।

अपने लेखन के माध्यम से जौहर ने ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना की और भारतीय राजनीतिक अधिकारों तथा स्वतंत्रता के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। उनके दोनों समाचार पत्र बाद में ब्रिटिश सरकार की कार्रवाई का सामना करते हुए बंद हो गए।

शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान

मोहम्मद अली जौहर का जुड़ाव शिक्षा के क्षेत्र से भी गहरा रहा। उन्होंने अलीगढ़ में उच्च शिक्षा के संस्थागत विकास के प्रयासों में योगदान दिया।

1920 में जामिया मिलिया इस्लामिया की स्थापना से जुड़े प्रमुख लोगों में भी उनका नाम शामिल रहा। संस्थान की स्थापना के पीछे औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था से अलग राष्ट्रीय शिक्षा की अवधारणा महत्वपूर्ण थी।

यही कारण है कि जौहर को केवल राजनीतिक नेता के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षा और पत्रकारिता से जुड़े व्यक्तित्व के रूप में भी देखा जाता है।

मुस्लिम लीग से कांग्रेस तक का राजनीतिक सफर

मोहम्मद अली जौहर ने 1906 में मुस्लिम लीग से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। बाद में वह संगठन के अध्यक्ष भी चुने गए।

इसके बाद वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और 1923 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने। इस तरह उनका राजनीतिक जीवन उस दौर की बदलती भारतीय राजनीति और हिंदू-मुस्लिम संबंधों के बीच विकसित हुआ।

हालांकि, बाद के वर्षों में उनके राजनीतिक विचार कांग्रेस नेतृत्व से कई मुद्दों पर अलग हो गए।

जौहर ने मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पृथक निर्वाचन जैसे मुद्दों पर अलग रुख अपनाया। यही कारण था कि आगे चलकर उनके और कांग्रेस के कई प्रमुख नेताओं के बीच मतभेद बढ़े।

खिलाफत आंदोलन में बड़ी भूमिका

मोहम्मद अली जौहर और उनके भाई शौकत अली खिलाफत आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल थे।

प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की के खलीफा की राजनीतिक स्थिति को लेकर भारतीय मुसलमानों में असंतोष बढ़ा। इसी पृष्ठभूमि में खिलाफत आंदोलन ने आकार लिया।

मोहम्मद अली जौहर ने इस आंदोलन को व्यापक राजनीतिक आंदोलन से जोड़ने का प्रयास किया। वह महात्मा गांधी समेत कई भारतीय नेताओं के साथ मंच साझा करते थे।

इसी दौर में खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन के बीच राजनीतिक सहयोग भी देखने को मिला।

ब्रिटिश सरकार ने जौहर की राजनीतिक गतिविधियों और भाषणों को गंभीरता से लिया। उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया और उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष जारी रखा।

गांधी से साथ भी रहा और मतभेद भी

मोहम्मद अली जौहर और महात्मा गांधी के बीच राजनीतिक सहयोग का एक महत्वपूर्ण दौर खिलाफत और असहयोग आंदोलनों के समय देखने को मिला।

हालांकि, बाद में दोनों नेताओं के बीच कई राजनीतिक मुद्दों पर मतभेद भी सामने आए।

विशेष रूप से 1928 की नेहरू रिपोर्ट को लेकर जौहर का रुख कांग्रेस के कई नेताओं से अलग था। नेहरू रिपोर्ट में संयुक्त निर्वाचन और संवैधानिक सुधारों सहित कई प्रस्ताव रखे गए थे, लेकिन जौहर मुस्लिम समुदाय के लिए पृथक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग के समर्थक बने रहे।

बाद के वर्षों में हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक मतभेद और गहरे होते गए।

गोलमेज सम्मेलन में भी हुए शामिल

1930 में खराब स्वास्थ्य के बावजूद मोहम्मद अली जौहर लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में शामिल हुए।

वह भारत के राजनीतिक भविष्य और स्वतंत्रता के प्रश्न को अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक मंच पर रखने के पक्षधर थे।

इसी दौरान उन्होंने भारत की स्वतंत्रता को लेकर बेहद दृढ़ रुख अपनाया। उनका स्पष्ट मत था कि वह स्वतंत्र भारत में लौटना चाहते हैं, न कि ब्रिटिश शासन के अधीन देश में।

लंदन में हुआ निधन, यरुशलम में दफनाए गए

मोहम्मद अली जौहर का निधन 4 जनवरी 1931 को लंदन में हुआ। उस समय वह गंभीर रूप से अस्वस्थ थे।

उनकी इच्छा के अनुसार उनके पार्थिव शरीर को यरुशलम ले जाया गया। उन्हें 23 जनवरी 1931 को मस्जिद अल-अक्सा परिसर के निकट दफनाया गया।

इस तरह रामपुर में जन्मे एक ऐसे नेता का जीवन समाप्त हुआ, जिसने पत्रकारिता, शिक्षा, राजनीति और ब्रिटिश शासन के विरोध—चारों क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई।

क्यों रखा गया यूनिवर्सिटी का नाम जौहर के नाम पर?

रामपुर में मोहम्मद अली जौहर के नाम पर विश्वविद्यालय बनाए जाने के पीछे उनके समर्थकों का तर्क है कि वह रामपुर से जुड़े स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद, पत्रकार और राजनीतिक नेता थे।

समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता मोहम्मद आसिम राजा के अनुसार, जौहर का जन्म रामपुर में हुआ था और उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके मुताबिक, शिक्षा और स्वतंत्रता आंदोलन में जौहर के योगदान के कारण विश्वविद्यालय का नाम उनके नाम पर रखा गया।

हालांकि, वर्तमान में विश्वविद्यालय से जुड़ा विवाद मुख्य रूप से इसके निर्माण, भूमि और भवनों से संबंधित प्रशासनिक तथा कानूनी मुद्दों को लेकर है। विश्वविद्यालय के नाम को लेकर चल रही चर्चा इसी व्यापक विवाद के बीच फिर सामने आई है।

मोहम्मद अली जौहर की विरासत

मोहम्मद अली जौहर का राजनीतिक जीवन कई विरोधाभासों से भरा रहा। वह मुस्लिम लीग के अध्यक्ष रहे, कांग्रेस के अध्यक्ष बने, गांधी के साथ आंदोलन किया और बाद में कांग्रेस नेतृत्व के कुछ फैसलों का विरोध भी किया।

लेकिन उनके जीवन की तीन प्रमुख पहचान स्पष्ट रूप से सामने आती हैं—स्वतंत्रता आंदोलन के नेता, प्रभावशाली पत्रकार और शिक्षा के समर्थक।

रामपुर में उनके नाम पर बना विश्वविद्यालय आज भले ही राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद के केंद्र में हो, लेकिन मोहम्मद अली जौहर का ऐतिहासिक महत्व ब्रिटिश शासन के दौर की भारतीय राजनीति, पत्रकारिता और शिक्षा के इतिहास से जुड़ा हुआ है।



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