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अमेरिका-ईरान जंग के बीच फंसा सऊदी अरब; 'विज़न 2030' पर मंडराया खतरा

by on | 2026-07-31 22:01:47

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अमेरिका-ईरान जंग के बीच फंसा सऊदी अरब; 'विज़न 2030' पर मंडराया खतरा

रियाद : अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच पिछले पांच महीनों से जारी भीषण संघर्ष की आग अब सऊदी अरब के दरवाजे तक पहुंच गई है। तीन तरफ से लगातार ड्रोन और मिसाइल हमलों का सामना करने के बाद सऊदी अरब का सब्र जवाब दे चुका है। इस हफ्ते रियाद ने अमेरिकी मध्य कमान के साथ मिलकर इराक में मौजूद ईरान समर्थित 'पॉप्युलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज' के ठिकानों पर संयुक्त हवाई हमले किए हैं।

हालांकि, क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के सामने अब सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि क्या वे इस युद्ध में पूर्ण रूप से उतरें या संयम और कूटनीति का रास्ता अपनाएं।

सऊदी अरब की सबसे बड़ी दुविधा: 'विज़न 2030' पर संकट

सऊदी अरब के वास्तविक शासक क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान देश को तेल निर्भरता से निकालकर आधुनिक अर्थव्यवस्था बनाने के लिए 'विज़न 2030' पर तेज़ी से काम कर रहे हैं।

  • विदेशी निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर का जोखिम: 'विज़न 2030' का पूरा दारोमदार वैश्विक निवेश, आधुनिक उद्योगों और विशाल डेटा सेंटरों पर टिका है। यदि देश पर ईरान और उसके प्रॉक्सी गुटों के मिसाइल/ड्रोन हमले जारी रहते हैं, तो कोई भी विदेशी कंपनी निवेश नहीं करेगी।

  • तेल अवसंरचना पर सीधा हमला: सितंबर 2019 में अबकैक और खुरैस तेल केंद्रों पर हुए विनाशकारी हमलों की यादें अभी ताजा हैं। हाल ही में अबकैक तेल शोधन केंद्र पर इराकी मिलिशिया द्वारा फिर से ड्रोन हमला किया गया है, जिसने रियाद की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है।

लाल सागर और होर्मुज की नाकाबंदी का असर

  • वैकल्पिक तेल मार्ग पर चोट: फरवरी में युद्ध छिड़ने के बाद ईरान ने 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को प्रभावी रूप से प्रभावित किया, जहां से दुनिया का 20% तेल गुजरता है। सऊदी अरब ने अपनी पूर्व-पश्चिम पाइपलाइन के जरिए लाल सागर तट से एशियाई बाजारों को रोजाना 50 लाख बैरल तेल सप्लाई करना शुरू किया था।

  • हूतियों का जवाबी हमला: 13 जुलाई को सना हवाई अड्डे पर बमबारी के बाद यमन के हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में सऊदी जहाजों और आभा व जिज़ान हवाई अड्डों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। इसके चलते संकरे 'बाब अल-मंदेब' समुद्री मार्ग से तेल टैंकरों का निकलना बेहद जोखिम भरा हो गया है।

आगे का रास्ता: सैन्य जवाब या कूटनीतिक समझौता?

सऊदी अरब ने यमन में 7 साल तक हूती विद्रोहियों के खिलाफ युद्ध लड़ा लेकिन बिना किसी ठोस नतीजे के 2022 में युद्धविराम करना पड़ा था। अब उत्तर में इराक और दक्षिण में यमन दोनों तरफ से हो रहे हमलों ने सऊदी रणनीतिकारों को असमंजस में डाल दिया है:

  1. सैन्य रास्ता: अमेरिका के साथ मिलकर इराक और यमन में ताबड़तोड़ हमले जारी रखना, जिससे पूरे खाड़ी क्षेत्र में पूर्णकालिक युद्ध छिड़ने का खतरा है।

  2. कूटनीतिक रास्ता: ईरान और उसके सहयोगियों के साथ फिर से सुरक्षा समझौते करना ताकि अपने बहुमूल्य तेल केंद्रों और 'विज़न 2030' के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स को सुरक्षित रखा जा सके।

बेबाक24 टेक

सऊदी अरब के लिए यह युद्ध किसी 'धर्मसंकट' से कम नहीं है। एक तरफ उसका रणनीतिक सहयोगी अमेरिका है, तो दूसरी तरफ अपने घरेलू आर्थिक पुनरुद्धार को विनाश से बचाने की मजबूरी। यदि रियाद सीधे तौर पर ईरान के खिलाफ इस युद्ध में उतरता है, तो उसकी दशकों की आर्थिक प्रगति और तेल अवसंरचना दांव पर लग जाएगी। यही कारण है कि सऊदी अरब सीमित जवाबी कार्रवाई के साथ-साथ तनाव घटाने के कूटनीतिक रास्ते तलाश रहा है।



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