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सीजेपी के देशव्यापी आंदोलन और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से क्या कांग्रेस को मिलेगा राजनीतिक माइलेज?

by admin@bebak24.com on | 2026-07-27 10:58:28

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सीजेपी के देशव्यापी आंदोलन और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से क्या कांग्रेस को मिलेगा राजनीतिक माइलेज?

नई दिल्ली: जंतर-मंतर पर 37 दिनों तक चले कॉकरोच जनता पार्टी के ऐतिहासिक आंदोलन, 25 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और संसद में जारी भारी हंगामे के बाद देश की सियासत में नया मोड़ आ गया है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा सुरक्षाबलों के लाठीचार्ज पर पीएम मोदी से माफी की मांग और गृह मंत्री अमित शाह को लिखे खत के बाद अब यह सवाल बड़ा हो गया है— क्या इस पूरे घटनाक्रम का सीधा राजनीतिक फायदा कांग्रेस और 'इंडिया' गठबंधन को मिलेगा?

'विपक्ष की एकजुटता'— कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि

राजनीतिक विश्लेषक हेमंत अत्री का मानना है कि इस आंदोलन का सबसे बड़ा असर विपक्ष की राजनीतिक ताकत बढ़ने से कहीं ज्यादा उसकी एकजुटता के रूप में सामने आया है:

  • पैन-इंडिया मूवमेंट: यह केवल दिल्ली के जंतर-मंतर तक सीमित नहीं था, बल्कि मुंबई, कोलकाता, पटना और लखनऊ तक फैले इस आंदोलन ने विरोध के स्वरों को एक मजबूत राष्ट्रीय मंच दिया।

  • एक मंच पर 'इंडिया' ब्लॉक: आंदोलन के दौरान कांग्रेस के साथ तृणमूल कांग्रेस (TMC), समाजवादी पार्टी (SP) और अन्य क्षेत्रीय दल एक स्वर में बोलते नजर आए, जिसने विपक्षी एकता को नई धार दी है।

"अन्ना आंदोलन जैसा पैटर्न, फायदा कांग्रेस को मिलना तय": आदेश रावल

राजनीतिक विश्लेषक आदेश रावल का तर्क है कि जब भी किसी सरकार के खिलाफ इतना बड़ा जनआंदोलन खड़ा होता है, तो उसका स्वाभाविक राजनीतिक लाभ सबसे बड़े विपक्षी दल को मिलता है:

आदेश रावल (राजनीतिक विश्लेषक):

"इतिहास गवाह है कि अन्ना हजारे आंदोलन के समय केंद्र में कांग्रेस (UPA) थी, लेकिन उसका सबसे बड़ा राजनीतिक फायदा बीजेपी को मिला। आज कांग्रेस देश की मुख्य विपक्षी पार्टी और 'इंडिया' गठबंधन का चेहरा है, इसलिए युवाओं के इस असंतोष का सीधा राजनीतिक लाभ कांग्रेस को मिलना तय है।"

'जेन-जी ने पीएम मोदी की राजनीतिक छवि को दी चुनौती

विश्लेषकों का मानना है कि 2013 के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जो 'अजेय' छवि बनी थी, उसे इस बार 'जेन-जी' (युवा पीढ़ी) ने सीधी चुनौती दी है:

  • गैर-धार्मिक और व्यावहारिक मुद्दे: नई पीढ़ी धर्म या जाति आधारित राजनीति के बजाय रोजगार, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली और अवसरों जैसे अपने प्रत्यक्ष सरोकारों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर रही है।

  • किसान आंदोलन से अलग प्रभाव: आदेश रावल के मुताबिक, किसान आंदोलन काफी लंबा चला था, लेकिन इस 37 दिन के छात्र आंदोलन ने प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत छवि और ब्रांड को ज्यादा सीधे तौर पर प्रभावित किया है, जिसके कारण सरकार को रणनीतिक रूप से धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार करना पड़ा और नंदन नीलेकणी के नेतृत्व में टास्क फोर्स गठित करनी पड़ी।

बीजेपी का काउंटर दांव: 'पद नहीं, देश प्राथमिकता'

दूसरी तरफ, बीजेपी और केंद्र सरकार ने इस नुकसान को नियंत्रित करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है:

  • अमित शाह का बयान: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक्स पर लिखा कि "बीजेपी में कार्यकर्ताओं के लिए पद नहीं, बल्कि देश और युवाओं का भविष्य ज्यादा महत्वपूर्ण है। सरकार युवाओं की भावनाओं का सम्मान करती है।"

  • नया कानून व टास्क फोर्स: सरकार संसद के मानसून सत्र में सख्त कानून लाने और नंदन नीलेकणी समिति के जरिए भविष्य की परीक्षाओं को सुरक्षित करने का नैरेटिव बना रही है ताकि युवाओं का भरोसा दोबारा जीता जा सके।

बेबाक24 टेक

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और सीजेपी आंदोलन का समापन कोई अंत नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों (महाराष्ट्र, झारखंड आदि) से पहले एक नए राजनीतिक नैरेटिव की शुरुआत है। राहुल गांधी और 'इंडिया' गठबंधन अब इस मुद्दे को केवल शिक्षा मंत्री तक सीमित न रखकर शीर्ष नेतृत्व की जवाबदेही तय करने में लगाएंगे। हालांकि, चुनाव में अभी समय है, इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इस जनाक्रोश को वोट बैंक में तब्दील कर पाती है या बीजेपी अपने त्वरित सुधारात्मक कदमों से युवाओं को फिर से अपने पाले में लाने में कामयाब होती है।



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