by on | 2026-07-18 19:32:03
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नई दिल्ली: नीट परीक्षा में कथित धांधली के खिलाफ दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 दिनों से अनशन पर बैठे सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक को शनिवार तड़के दिल्ली पुलिस द्वारा जबरन हटाकर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराए जाने के बाद एक बड़ा कानूनी और संवैधानिक सवाल खड़ा हो गया है। दिल्ली पुलिस जहां इस कार्रवाई को दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश और स्वास्थ्य सुरक्षा का हवाला दे रही है, वहीं कॉकरोच जनता पार्टी और विपक्ष इसे 'अदालत की अवमानना' और मौलिक अधिकारों का हनन बता रहे हैं।
इस घटनाक्रम के बीच 'क्या किसी भूख हड़ताल करने वाले को जबरन उठाया या इलाज दिया जा सकता है?'
विषय पर 'बेबाक24' के लीगल और कॉन्स्टिट्यूशनल अफेयर्स डेस्क की विशेष कानूनी पड़ताल:
सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई ऐतिहासिक फैसलों में यह साफ किया है कि अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से अनशन या भूख हड़ताल पर बैठना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है।
गांधीवादी सत्याग्रह को मान्यता: देश की शीर्ष अदालत के मुताबिक, भूख हड़ताल विरोध जताने का एक ऐसा माध्यम है जिसे भारतीय इतिहास और हमारे संवैधानिक न्यायशास्त्र (Constitutional Jurisprudence) दोनों ने मान्यता दी है। इसकी प्रेरणा महात्मा गांधी के सत्याग्रह से मिलती है।
सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया है कि सरकार के किसी फैसले के खिलाफ किसी व्यक्ति का अनिश्चितकालीन अनशन अपने आप में 'सार्वजनिक व्यवस्था' (Public Order) के लिए खतरा नहीं माना जा सकता। जब तक सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने या सामाजिक अव्यवस्था फैलने के वास्तविक सबूत न हों, तब तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) के तहत चल रहे अनशन में सरकार टकराव का रवैया नहीं अपना सकती।
अक्सर प्रशासन भूख हड़ताल पर बैठे लोगों पर आईपीसी की धारा 309 (आत्महत्या का प्रयास) के तहत मामला दर्ज कर उन्हें जबरन हटाने की कोशिश करता रहा है। लेकिन न्यायपालिका ने इस पर बेहद कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है:
मद्रास हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला (फरवरी 2021): जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश की पीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए साफ कहा था कि "भूख हड़ताल करना आईपीसी की धारा 309 के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आता।"
इलाज से इनकार अपराध नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यदि कोई व्यक्ति शांतिपूर्ण विरोध के दौरान अपनी तबीयत बिगड़ने पर भी मेडिकल मदद लेने या डॉक्टरों का सहयोग करने से इनकार करता है, तो भी उसे अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। न्यायपालिका लगातार जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार (अनुच्छेद 19) के बीच संतुलन बनाने की वकालत करती आई है।
साल 2024 के आखिरी महीनों में 70 वर्षीय किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल शंभू बॉर्डर पर 20 दिनों से अधिक समय तक भूख हड़ताल पर बैठे थे, जिन्हें पुलिस ने जबरन अस्पताल में भर्ती कराया था। तब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और पंजाब सरकार को सख्त निर्देश दिए थे कि:
"सरकार को डल्लेवाल की उम्र और सेहत को देखते हुए पर्याप्त मेडिकल मदद तो उपलब्ध करानी चाहिए, लेकिन साथ ही उनके आंदोलन और असहमति जताने के फैसले का पूरा सम्मान करना होगा। राज्य का कर्तव्य जीवन की रक्षा करना है, विरोध को कुचलना नहीं।"
साल 2011 में जब तत्कालीन यूपीए सरकार ने बाबा रामदेव को भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रस्तावित भूख हड़ताल से रोकने के लिए पुलिसिया बल का इस्तेमाल किया था, तब सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए सरकार के टकराव वाले रवैये की सख्त निंदा की थी और इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर चोट बताया था।
शनिवार तड़के हुई कार्रवाई को लेकर कानूनी विशेषज्ञों और कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ताओं ने पुलिस की मंशा पर सवाल उठाए हैं:
निगरानी का आदेश, गिरफ्तारी का नहीं: सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास और वकील आशीष गोयल के मुताबिक, दिल्ली हाई कोर्ट ने केवल सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य की निरंतर निगरानी करने और स्थिति गंभीर होने पर डॉक्टरी सलाह से कदम उठाने को कहा था। कोर्ट ने यह कभी नहीं कहा कि एक स्वस्थ और मानसिक रूप से सक्रिय व्यक्ति को तड़के सुबह जबरन घसीटकर उठा लिया जाए।
मनमर्जी का हस्तक्षेप गलत: कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जब कोई व्यक्ति सत्तारूढ़ सरकार की जवाबदेही तय करने के लिए अनशन पर बैठता है, तो उसी सरकार या उसके अधीन काम करने वाली पुलिस को यह तय करने का एकाधिकार नहीं दिया जा सकता कि कब और कैसे अनशनकारी को जबरन अस्पताल में ठूंसना है। ऐसा करना सरकार को विरोध दबाने की खुली छूट देने जैसा होगा।
सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से हटाने के पीछे पुलिस भले ही कानून और मेडिकल इमरजेंसी का पर्दा डाल रही हो, लेकिन कानूनी इतिहास और अदालतों के फैसले इसके बिल्कुल उलट गवाही देते हैं। भारत का संविधान हर नागरिक को शांतिपूर्ण तरीके से 'सत्याग्रह' करने का अधिकार देता है।
बेबाक24 का कानूनी विश्लेषण कहता है कि सरकारें अक्सर अनशनकारियों की गिरती सेहत की आड़ में जन-आंदोलनों की धार को कुंद करने का प्रयास करती हैं। वांगचुक के मामले में भी 20 जुलाई को होने वाले 'संसद मार्च' के डर से यह जल्दबाजी दिखाई गई है। यदि सरकार सचमुच वांगचुक के जीवन को लेकर चिंतित है, तो उसे उनकी पत्नी गीतांजलि की इस मांग का सम्मान करना चाहिए कि उनकी मर्जी के बिना उन्हें ड्रिप या दवाएं न दी जाएं। लोकतंत्र में किसी के शरीर पर जबरन काबू पाकर उसके विचारों और असहमति की आवाज को कैद नहीं किया जा सकता।
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