by on | 2026-07-18 19:18:28
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नई दिल्ली/वॉशिंगटन: अमेरिका की जांच एजेंसियों (FBI) द्वारा भारत की जेल में बंद गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क पर की गई बड़ी कार्रवाई के बाद कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। अमेरिकी कैलिफ़ोर्निया अटॉर्नी ऑफिस की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, एफबीआई और कनाडाई सुरक्षा एजेंसियों के संयुक्त 'ऑपरेशन हार्डबॉल' के तहत अमेरिका, कनाडा और यूरोप से 24 संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया है।
संघीय ग्रैंड ज्यूरी द्वारा जारी तीन चार्जशीटों में लॉरेंस बिश्नोई, सतिंदरजीत उर्फ गोल्डी बरार और जग्गू भगवानपुरिया समेत 37 लोगों को नामजद किया गया है। इन पर अमेरिका की धरती पर नशा तस्करी, जबरन वसूली, हथियारों की अवैध सप्लाई और कनाडा में हुए हरदीप सिंह निज्जर के कत्ल की साजिश रचने का गंभीर आरोप है। इस घटनाक्रम के बाद सोशल मीडिया और कूटनीतिक हलकों में यह सवाल सबसे बड़ा बन गया है कि क्या अमेरिका लॉरेंस बिश्नोई को अपने सुपुर्द करने की मांग कर सकता है और भारत के पास क्या कानूनी रास्ते हैं?
'बेबाक24' के अंतरराष्ट्रीय कानून, भू-राजनीति और सुरक्षा मामलों के डेस्क की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट:
इस सवाल का सीधा और कानूनी जवाब है— हां, ऐसा किया जा सकता है, लेकिन इसकी राह बेहद लंबी और कानूनी पेचीदगियों से भरी है।
भारत और अमेरिका के बीच साल 1997 में एक द्विपक्षीय प्रत्यर्पण संधि हुई थी। इस संधि के तहत किसी भी अपराधी को दूसरे देश के सुपुर्द करने के लिए कुछ बेहद सख्त कानूनी शर्तें पूरी करनी होती हैं:
दोहरी आपराधिकता (Dual Criminality): अमेरिकी कानून और भारतीय कानून दोनों के तहत वह कृत्य एक दंडनीय अपराध होना चाहिए।
न्यूनतम सजा का प्रावधान: जिस अपराध के तहत प्रत्यर्पण मांगा जा रहा है, उसमें दोनों देशों के कानून में कम से कम 1 साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान होना जरूरी है।
औपचारिक कूटनीतिक चैनल: अमेरिकी प्रशासन को प्रत्यर्पण के लिए भारत सरकार को आधिकारिक राजनयिक दस्तावेज (जैसे अरेस्ट वारंट, चार्जिंग डॉक्यूमेंट और पुख्ता सबूत) भेजने होंगे, जो यह साबित करें कि उस व्यक्ति पर अमेरिकी अदालत में मुकदमा चलाना पूरी तरह जायज है।
क्रिमिनल मामलों के एक्सपर्ट्स के मुताबिक, प्रत्यर्पण की यह प्रक्रिया पूरी तरह से भारत सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति और न्यायिक समीक्षा पर निर्भर करती है। यदि सरकार इस प्रक्रिया को तेज करना चाहे तो यह जल्दी हो सकता है, अन्यथा कानूनी अपीलों के कारण ऐसे मामले भारतीय अदालतों में सालों तक खिंचते रहते हैं।
अकसर यह सवाल उठाया जा रहा है कि यदि खालिस्तान समर्थक कार्यकर्ता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या 18 जून 2023 को कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया (सरे) में हुई थी, तो अमेरिकी अदालतें इस मामले में कैसे दखल दे रही हैं?
अमेरिकी संघीय वकीलों ने साफ किया है कि यह कार्रवाई किसी एक हत्या तक सीमित नहीं है। एफबीआई की चार्जशीट के अनुसार, बिश्नोई गैंग साबरमती जेल (अहमदाबाद) के अंदर से अवैध मोबाइल फोन और वीओआईपी (VoIP) डिवाइस के जरिए अमेरिका की धरती (विशेषकर कैलिफ़ोर्निया और लॉस एंजिल्स) पर सक्रिय गिरोहों को संचालित कर रहा था। चूंकि यह गैंग अमेरिका में ड्रग्स और हथियारों की तस्करी के साथ-साथ वहां के नागरिकों से जबरन वसूली कर रहा था, इसलिए कनाडाई मर्डर मिस्ट्री भी इसी बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठित आपराधिक सिंडिकेट (RICO/Conspiracy) का हिस्सा बन जाती है। अमेरिकी कानून के तहत, यदि किसी अपराध के तार या उसकी साजिश अमेरिका से जुड़ी है, तो वे सीमा पार हुए अपराधों पर भी मुकदमा चलाने का अधिकार रखते हैं।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि इस वैश्विक गैंगस्टर्स नेटवर्क पर कार्रवाई से भारत और अमेरिका के सुरक्षा संबंध कमजोर होने के बजाय और अधिक मजबूत होंगे।
पुरानी मिसालें: सुरक्षा सहयोग की पुरानी मिसालों को देखें तो 2008 के मुंबई हमलों के आरोपी डेविड हेडली का भले ही अमेरिका ने प्रत्यर्पण नहीं किया था, लेकिन अमेरिकी जेल में रहते हुए उसने भारतीय एजेंसियों (NIA) को पूरी जांच में मदद की थी।
तहव्वुर राना का प्रत्यर्पण: इसी सिंडिकेट के एक और बड़े आरोपी तहव्वुर हुसैन राना को अमेरिकी अदालतों की मंजूरी के बाद पिछले साल (10 अप्रैल 2025) ही विशेष विमान से भारत प्रत्यर्पित किया जा चुका है, जो इस बात का सबूत है कि दोनों देश प्रत्यर्पण संधि का पूरा सम्मान करते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत खुद लंबे समय से लॉरेंस बिश्नोई और गोल्डी बरार के वैश्विक नेटवर्क को ध्वस्त करने की मांग करता रहा है। ऐसे में अमेरिका द्वारा इन गिरोहों पर शिकंजा कसना भारत के राष्ट्रीय हितों के अनुकूल ही है।
लॉरेंस बिश्नोई गैंग पर अमेरिका का यह कानूनी हंटर भारत के लिए एक मिली-जुली चुनौती लेकर आया है। एक तरफ यह साफ हो गया है कि भारतीय जेलों की सुरक्षा व्यवस्था में सेंध लगाकर ये गैंगस्टर्स अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि को नुकसान पहुंचा रहे थे, जिस पर लगाम लगाना बेहद जरूरी है। दूसरी तरफ, अमेरिका के साथ प्रत्यर्पण का यह मामला कूटनीतिक रूप से काफी संवेदनशील है।
बेबाक24 का विश्लेषण कहता है कि भारत को अमेरिका की इस कानूनी पहल का स्वागत करना चाहिए और दोनों देशों की जांच एजेंसियों को मिलकर इस नेटवर्क को जड़ से उखाड़ना चाहिए। हालांकि, लॉरेंस बिश्नोई का प्रत्यर्पण इतनी जल्दी संभव नहीं होगा क्योंकि भारत में बाबा सिद्दीकी हत्याकांड, मूसेवाला मर्डर और रंगदारी के दर्जनों बड़े मामलों का ट्रायल अभी पेंडिंग है। भारत पहले अपनी अदालतों में इन मामलों का निपटारा करना चाहेगा, लेकिन इस दौरान अमेरिकी जांच में पूरा सहयोग देकर दोनों देश वैश्विक आतंकवाद और संगठित अपराध के खिलाफ अपनी रणनीतिक साझेदारी को एक नए मुकाम पर ले जा सकते हैं।
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