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बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट पर भारत-जापान में कूटनीतिक रार: जापानी पूर्व मंत्री के 'लापरवाह' वाले बयान पर भारत का करारा जवाब

by admin@bebak24.com on | 2026-07-18 14:58:07

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बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट पर भारत-जापान में कूटनीतिक रार: जापानी पूर्व मंत्री के 'लापरवाह' वाले बयान पर भारत का करारा जवाब

नई दिल्ली: मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल प्रोजेक्ट (बुलेट ट्रेन परियोजना) को लेकर भारत और जापान के बीच एक नया कूटनीतिक और तकनीकी विवाद खड़ा हो गया है। जापान के एक पूर्व मंत्री द्वारा सोशल मीडिया पर भारत की कार्यशैली को 'लापरवाह' बताने के बाद देश में सियासत गर्मा गई है। विपक्ष जहां इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेर रहा है, वहीं भारत सरकार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे महज 'एक व्यक्ति की राय' करार दिया है।

इस पूरे विवाद, इसके पीछे की तकनीकी वजहों और भारत सरकार के आधिकारिक रुख पर एक विस्तृत रिपोर्ट:

जापान के पूर्व मंत्री ने लगाए गंभीर आरोप

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब जापान के पूर्व उप अर्थव्यवस्था, व्यापार और उद्योग मंत्री हिदेकी माकिहारा ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर की। उन्होंने भारत की बुलेट ट्रेन परियोजना से जुड़े अपने पुराने अनुभवों का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि अंतरराष्ट्रीय बैठकों और बातचीत के दौरान भारतीय पक्ष की कार्यशैली बेहद लापरवाह रही। माकिहारा ने दावा किया कि भारतीय पक्ष अपने वादे पूरे नहीं करता और परियोजना में हो रही देरी के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है।

जापान के इस पूर्व मंत्री की टिप्पणी को भारत के विपक्षी दलों ने हाथों-हाथ लिया है। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी नेताओं ने इसे सरकार की नाकामी बताते हुए कहा है कि भारत के एक बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रोजेक्ट को ठीक से हैंडल नहीं किया गया, जिसके चलते अब विदेशी मंचों पर भी आलोचना हो रही है।

सिग्नल सिस्टम और ट्रेनों की डिलीवरी का असली पेंच

माकिहारा का यह गुस्सा असल में भारत में काम कर रहे एक जापानी इंजीनियर इसाओ त्सुजिमुरा के एक ऑनलाइन लेख से जुड़ा हुआ है। इस लेख में बुलेट ट्रेन के पहले चरण को लेकर चल रहे तकनीकी मतभेदों का खुलासा किया गया है:

  • तकनीकी बदलाव की कोशिश: लेख के मुताबिक, भारत इस प्रोजेक्ट के पहले फेज के लिए यूरोपीय मूल के सिग्नलिंग सिस्टम और नई भारतीय हाई-स्पीड ट्रेनों का इस्तेमाल करना चाहता है, जबकि जापान का मानना है कि इतनी बड़ी फंडिंग (करीब 81%) देने के बाद इसमें उनकी ही शिंकानसेन तकनीक का इस्तेमाल होना चाहिए।

  • अनुकूलता का दावा: जापानी इंजीनियर का कहना है कि यूरोपीय सिग्नल सिस्टम जापान की बुलेट ट्रेन तकनीक के साथ मैच नहीं करेगा और इससे यह प्रोजेक्ट अधूरा रह सकता है।

तथ्यों के साथ भारत सरकार का दोटूक जवाब

भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इन आरोपों पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि यह टिप्पणी जमीनी हकीकत और तथ्यों से कोसों दूर है। भारत और जापान के बीच प्रोजेक्ट को लेकर बातचीत बिल्कुल सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है। भारत ने जापानी दावों के जवाब में महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखे हैं:

  • जापान की अपनी ट्रेनों में देरी: भारतीय रेल मंत्रालय के अनुसार, जापान इस प्रोजेक्ट के लिए जो एडवांस ट्रेन सीरीज (E10/E20) देने वाला है, वे अभी खुद जापान में डेवलपमेंट (विकास) के दौर में हैं। जापान इन ट्रेनों की डिलीवरी साल 2030 के शुरुआती वर्षों से पहले करने की स्थिति में नहीं है।

  • समय पर काम पूरा करने का संकल्प: चूंकि यह प्रोजेक्ट पहले ही भूमि अधिग्रहण जैसी दिक्कतों की वजह से अपनी पुरानी समयसीमा (2023) से लेट हो चुका है, इसलिए भारत इसे और ज्यादा नहीं लटकाना चाहता। दोनों देश इस बात पर सहमत हैं कि 15 अगस्त 2027 तक सूरत और बिलिमोरा के बीच पहले चरण का ऑपरेशन शुरू कर दिया जाएगा, जिसके लिए भारतीय ट्रेनों और अंतरराष्ट्रीय मानक वाले सिग्नल सिस्टम का उपयोग किया जा रहा है।

मजबूत बने हुए हैं दोनों देशों के आर्थिक संबंध

इस बयानबाजी से इतर, भारत और जापान के बीच रणनीतिक और व्यापारिक रिश्ते बेहद मजबूत बने हुए हैं। हाल ही में जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची ने भी भारत का तीन दिवसीय दौरा किया था, जिसका मकसद दोनों देशों के बीच सुरक्षा और आर्थिक सहयोग को और गहरा करना था।

आंकड़ों के मुताबिक, पिछले एक साल में दोनों देशों के बीच करीब 120 नए बिजनेस एग्रीमेंट हुए हैं, जिससे भारत में 10 अरब डॉलर से अधिक का जापानी निवेश आ रहा है। जापान आज भी भारत को सबसे ज्यादा विकास सहायता (लोन) देने वाला देश है, जिसका इस्तेमाल दिल्ली मेट्रो से लेकर देश के पहले बुलेट ट्रेन कॉरिडोर जैसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में किया जा रहा है।

बेबाक24 नजरिया

बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को लेकर सामने आया यह विवाद केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि तकनीकी आत्मनिर्भरता से जुड़ा है। भारत का यह फैसला पूरी तरह व्यावहारिक नजर आता है कि अगर जापानी ट्रेनें आने में 2030 तक का वक्त लगेगा, तो 2027 में तैयार होने वाले ट्रैक को खाली छोड़ने का कोई मतलब नहीं है। भारत ने वंदे भारत जैसी ट्रेनों को बनाकर यह साबित किया है कि देश में हाई-स्पीड रेल को लेकर क्षमताएं बढ़ी हैं।

जापान हमारा एक बेहद भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार है, लेकिन किसी विदेशी पूर्व अधिकारी द्वारा भारतीय व्यवस्था पर इस तरह की अभद्र टिप्पणी करना कूटनीतिक लिहाज से सही नहीं है। भारत सरकार को अपने हितों और डेडलाइन को ध्यान में रखते हुए, अंतरराष्ट्रीय मानकों के साथ इस प्रोजेक्ट को तय समय पर पूरा करने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ना चाहिए।



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