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मौत की खदान' में दबे 7 मज़दूर: 20 लाख 50 हज़ार के मुआवज़े के बावजूद न्याय पर सवाल

by admin@bebak24.com on | 2025-12-11 20:43:50

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मौत की खदान' में दबे 7 मज़दूर: 20 लाख 50 हज़ार के मुआवज़े के बावजूद न्याय पर सवाल


अजय सिंह

सोनभद्र: एशिया की 'ऊर्जा राजधानी' कहे जाने वाले सोनभद्र की पहचान अब 'मौत की खदानों' से होने लगी है। बीते 15 नवंबर 2025 को ओबरा थाना क्षेत्र के बिल्ली-मारकुंडी स्थित 'कृष्णा माइनिंग वर्क्स' में हुए दर्दनाक हादसे ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि यहाँ मजदूरों की जान की कीमत पत्थर के टुकड़ों से भी कम है।

दोपहर के वक्त जब ड्रिलिंग का शोर गूंज रहा था, तभी पहाड़ का एक विशाल हिस्सा मौत बनकर गिरा और 300 फीट गहरी खाई में जिंदगी हमेशा के लिए दफन हो गई थी। इस दर्दनाक घटना के बाद एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमों ने आधुनिक उपकरणों के साथ मिलकर 70 से 80 घंटे तक चले बचाव अभियान में सात मजदूरों के शवों को बाहर निकाला था।

 मंत्री का वादा, कहाँ गया एक्शन?

जनपद के प्रभारी मंत्री रवीन्द्र जायसवाल ने मेडिकल कॉलेज के पोस्टमार्टम हाउस पर पीड़ित परिवारों से मुलाकात की और मुआवजा ₹20 लाख 50 हजार की घोषणा की थी। उन्होंने कड़े एक्शन का आश्वासन देते हुए कहा था:

> "इस खनन हादसे के लिए जो भी दोषी होगा, चाहे वह कितना भी रसूखदार क्यों न हो, उसे बख्शा नहीं जाएगा। दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी।"

हालांकि, मंत्री का यह वादा अब ठंडे बस्ते में पड़ा से प्रतीत हो रहा है, क्योंकि हादसे के मुख्य आरोपी, सत्ताधारी दल से कथित तौर पर जुड़े होने के कारण, जाँच एजेंसियों की गिरफ्त से दूर बने हुए हैं।

 राजनीतिक 'कनेक्शन' की आशंका: मुख्य आरोपी फरार

जाँच एजेंसियों ने इस मामले में मेसर्स श्री कृष्णा माइनिंग वर्क्स के खदान मालिक मधुसूदन सिंह (पूर्व ब्लाक प्रमुख), दिलीप केसरी और एक अज्ञात पर गैर-इरादतन हत्या (Non-Bailable Homicide) समेत सुसंगत धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है।

सूत्रों के अनुसार, पट्टाधारक मधुसूदन सिंह (पूर्व ब्लाक प्रमुख) सत्ताधारी दल के एक बड़े जनप्रतिनिधि के बेहद करीबी बताए जाते हैं। यह कनेक्शन इस आशंका को बल देता है कि नियम-विरुद्ध खनन को उच्च-स्तरीय राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था।

 छोटे स्टाफ गिरफ्तार, 'किंगपिन' गायब !

CO ओबरा हर्ष पांडेय की निगरानी में बनी SIT टीम चार माइनिंग स्टाफ को गिरफ्तार कर जेल भेज देती है। लेकिन, मुख्य अभियुक्त मधुसूदन सिंह, दिलीप केसरी और एक अज्ञात का घटना के लगभग एक महीने बाद भी SIT टीम की गिरफ्त से दूर बने हुए हैं।

बेबाक24 टीम के रिपोर्टर अजय सिंह ने ओबरा SHO विजय चौरसिया और CO हर्ष पांडेय जी से मुख्य अभियुक्तों के पकड़ के सम्बंध में बात की, तो उनके बयान विरोधाभासी लगे और मुख्य आरोपियों को पकड़ने में पुलिस की ढिलाई को दर्शाते हैं:

 * SHO विजय चौरसिया: "एक मुख्य अभियुक्त मधुसूदन सिंह ने NBW के अगेंस्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट से गिरफ्तारी में स्टे ले लिया है और दिलीप केशरी और एक अज्ञात के लिए पुलिस टीम द्वारा दबिश दी जा रही है, लेकिन वो अभी गिरफ्त में नहीं आए हैं।"

 * CO हर्ष पांडेय: "मुख्य तीनो आरोपियों के लिए कोर्ट से NBW (Non-Bailable Warrant) वारंट जारी हो चुका है, लेकिन वो फरार चल रहे हैं और कोर्ट से CrPC 82 लगते ही दबिश और ठोस कार्यवाही के लिए हमारी टीम और मजबूती से कार्य कर पाएगी।"

 क्या है CrPC 82? गिरफ्तारी से बचने वालों के लिए आखिरी चेतावनी

पुलिस और प्रशासन जिस CrPC 82 की बात कर रहे हैं, वह दरअसल एक कानूनी हथियार है जिसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब कोई आरोपी जानबूझकर गिरफ्तारी से बच रहा हो। इसे 'फरार व्यक्ति के लिए उद्घोषणा' (Proclamation for Person Absconding) कहते हैं।

आसान शब्दों में इसका मतलब:

जब कोई आरोपी कोर्ट द्वारा जारी वारंट के बाद भी जानबूझकर नहीं पकड़ा जाता है, तब कोर्ट एक सार्वजनिक घोषणा जारी करता है। इस घोषणा में आरोपी को एक तय समय (आमतौर पर 30 दिन) के भीतर कोर्ट के सामने पेश होने का निर्देश दिया जाता है।

इसका असर:

 * यह एक सार्वजनिक चेतावनी है कि व्यक्ति कानून से भाग रहा है।

 * अगर आरोपी इस समय सीमा में पेश नहीं होता है, तो पुलिस या कोर्ट उसकी गिरफ्तारी के लिए CrPC 83 (संपत्ति कुर्क करना) की कार्यवाही शुरू कर सकते हैं। यानी, भागे हुए आरोपी की चल-अचल संपत्ति जब्त करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

ऐसे में, CO हर्ष पांडेय का यह बयान कि CrPC 82 लगते ही टीम और मजबूती से कार्य कर पाएगी, यह दर्शाता है कि पुलिस अब मुख्य आरोपियों की संपत्ति जब्त करने की तैयारी में है ताकि उन पर दबाव बनाया जा सके। यह देखना होगा कि यह 'मजबूती' कब तक मुख्य आरोपियों को कानून के कटघरे में ला पाती है।



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