by on | 2026-09-29 12:03:41
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लखनऊ। प्रशासनिक गद्दी का रौब, लाल बत्ती का रुतबा और 13 साल का आईएएस कैडर... सब कुछ पीछे छोड़कर 2013 बैच की पूर्व अधिकारी दिव्या मित्तल ने राजनीति के अखाड़े में सीधे उतरने का ऐलान कर दिया है। 30 अगस्त 2026 को दिया गया इस्तीफा 14 सितंबर को मंजूर क्या हुआ, दिव्या मित्तल ने सीधे सिस्टम से टकराने का बिगुल फूंक दिया।
साफ कह दिया है—“न डरूंगी, न झुकूंगी, बस सवाल करूंगी।”
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जाति, बाहुबल, धनबल और बड़े-बड़े राजनीतिक दलों के झंडों से बंधे उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारे में क्या दिव्या मित्तल का यह ‘बिना पार्टी’ वाला फॉर्मूला चल पाएगा?
मिर्जापुर से देवरिया तक की छाप, अब सीधे सिस्टम पर वार
मिर्जापुर, संत कबीर नगर और देवरिया में डीएम रहते हुए दिव्या मित्तल का काम सुर्खियों में रहा। मिर्जापुर के पथरीले और दुर्गम लहुरिया दह गांव में दशकों बाद नल से पानी पहुंचाना उनकी प्रशासनिक इच्छाशक्ति की मिसाल बना। लेकिन अब, वही दिव्या मित्तल उसी सरकारी तंत्र की नाकामियों—सड़क, स्कूल, बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था और जमीनी स्तर पर योजनाओं की ढिलाई—पर जनता की ओर से सवाल दागने की तैयारी में हैं।
राजनीति में एंट्री के लिए उन्होंने जो रास्ता चुना है, वह किसी स्थापित दल का दामन थामने का नहीं है। उन्होंने दो तुक शब्दों में स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी पार्टी के झंडे तले नहीं, बल्कि जनता के सीधे सहयोग से अपनी राजनीतिक राह तय करेंगी।
क्या यूपी में चलेगा बिना बाहुबल और धनबल का पैच?
दिव्या मित्तल का दावा है कि वह जाति, धर्म, पैसे और रंगदारी वाली पारंपरिक राजनीति से अलग हटकर काम करेंगी। मगर, सियासी हलकों में चर्चाएं गर्म हैं:
संगठन का ढांचा कहां है? बिना किसी स्थापित काडर और बूथ-स्तर के कार्यकर्ताओं के, एक स्वतंत्र राजनीतिक मंच खड़ा करना उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है।
चुनावी मैदान का सस्पेंस: क्या वह सिर्फ एक दबाव समूह (Pressure Group) के रूप में काम करेंगी या किसी खास विधानसभा/लोकसभा सीट से चुनावी ताल ठोकेंगी? इस पर उन्होंने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं।
‘बेबाक’ नजरिया: क्या यह सिर्फ पब्लिसिटी का दांव है या नए दौर की आहट?
नौकरशाही से निकलकर नेताओं की कतार में खड़े होने वाले अफसरों की यूपी में कमी नहीं रही है। लेकिन ज्यादातर ने किसी स्थापित पार्टी का सिंबल पकड़कर ही अपनी गद्दी बचाई है। दिव्या मित्तल का यह कहना कि "बिना किसी झंडे के जनता का मंच बनाएंगी", सुनने में तो लुभावना लगता है, पर क्या यह जमीन पर टिक पाएगा?
अगर यह सिर्फ राजनीतिक महत्वाकांक्षा की शुरुआत है, तो उत्तर प्रदेश का सियासी समंदर बहुत गहरा है। और अगर यह वाकई किसी व्यवस्था परिवर्तन का पहला कदम है, तो आने वाले दिनों में सत्ता और विपक्ष दोनों को दिव्या मित्तल के सवालों का जवाब देने के लिए तैयार रहना होगा।
फिलहाल, कयासों का बाजार गर्म है और निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि ब्यूरोक्रेसी का 'रौब' छोड़कर उतरीं दिव्या मित्तल का अगला कदम क्या होता है!
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