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शहादत की धरती, जहां हर साल धड़कता है 'कृष्णानंद' का दिल

by admin@bebak24.com on | 2025-11-27 11:37:42

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शहादत की धरती, जहां हर साल धड़कता है 'कृष्णानंद' का दिल

गाजीपुर (उत्तर प्रदेश): 29 नवंबर 2005 की तारीख पूर्वांचल के सियासी इतिहास में एक गहरे घाव की तरह दर्ज है। यह वह काला दिन था, जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के जुझारू विधायक स्वर्गीय कृष्णानंद राय सहित उनके सात साथी, माफिया राज के खिलाफ लड़ते हुए एके-47 की सैकड़ों गोलियों का शिकार हो गए थे। बसनिया चट्टी पर हुई यह जघन्य घटना मात्र एक हत्या नहीं थी, बल्कि उस 'वीर' के हौसले को कुचलने का प्रयास था, जिसने मुख्तार अंसारी के प्रभाव वाली मोहम्मदाबाद सीट पर 2002 में उसके भाई अफजाल अंसारी को हराकर जीत हासिल की थी।

शहादत दिवस: श्रद्धा के सुमन और हुंकार


हर वर्ष, कृष्णानंद राय के शहादत दिवस पर गाजीपुर की धरती हिंदुत्व के लिए सहादत देने वाले इस लोकप्रिय विधायक को श्रद्धा के सुमन अर्पित करने के लिए उमड़ पड़ती है। यह दिन न केवल दिवंगत आत्माओं को याद करने का है, बल्कि माफिया और आताताईयों के जबड़े मरोड़कर क्षेत्र को मुक्ति दिलाने वाले भाजपा विधायक स्व कृष्णानंद राय अधूरे संघर्ष को जारी रखने की शपथ लेने का भी है।

इस अवसर पर, भाजपा के तमाम दिग्गज नेता, कार्यकर्ता और हजारों की संख्या में उनके प्रशंसक स्वतः ही यहां आते हैं। बिहार के फायर ब्रांड नेता और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह जैसे मुखर नेता, उप मुख्यमंत्री बृजेश पाठक जैसे शीर्षस्थ नेता भी अक्सर इन कार्यक्रमों में शामिल होते हैं। वे सभी दिवंगत विधायक की विधवा पत्नी पूर्व विधायक अलका राय और अब भाजपा नेता बन चुके उनके पुत्र पीयूष राय के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होने का दम भरते हैं, ताकि माफिया अंसारी बंधुओं के खिलाफ यह लड़ाई जारी रहे।


उस दिन क्या हुआ था?

कृष्णानंद राय की हत्या उस समय हुई, जब प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी की सरकार थी। वह सियाडी गांव में एक क्रिकेट प्रतियोगिता का उद्घाटन कर बुलेटप्रूफ गाड़ी छोड़कर सामान्य वाहन से लौट रहे थे। हमलावरों ने घात लगाकर उनके काफिले को बसनिया चट्टी के पास घेर लिया।

> रिपोर्ट्स के अनुसार, हमलावरों ने छह एके-47 राइफलों से 500 राउंड से अधिक अंधाधुंध फायरिंग की। गोलियों की तड़तड़ाहट से पूरा इलाका थर्रा उठा। कृष्णानंद राय के शरीर से 67 गोलियां निकाली गई थीं। इस नृशंस हत्याकांड को मुख्तार अंसारी गैंग ने अंजाम दिया था, जिस पर हत्याकांड के मुख्य साजिशकर्ता होने का आरोप लगा।

यह घटना पूर्वांचल की राजनीति में एक बड़े प्रतिशोध के रूप में देखी गई थी। मुख्तार अंसारी ने कृष्णानंद राय की जीत को अपने राजनीतिक वर्चस्व पर सीधी चुनौती माना था।


 माफिया राज के खिलाफ लड़ाई जारी

विधायक कृष्णानंद राय का 'आस्क' (आकर्षण और तलाश) आज भी उनके दीवानों को हर वर्ष इस स्थान पर खींच लाता है। उनकी शहादत ने भले ही पूर्वांचल की राजनीति को हिलाकर रख दिया हो, लेकिन उनकी विरासत, उनकी धर्मपत्नी अलका राय और पुत्र पीयूष राय के रूप में आज भी माफिया राज के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बनी हुई है। उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद, माफिया और गैंगस्टर के खिलाफ योगी सरकार की सख्ती से अलका राय और उनके समर्थकों को न्याय की आस जगी है।

यह शहादत दिवस हर साल गाजीपुर में सत्ता की क्रूरता और जनता के अडिग विश्वास की कहानी को दोहराता है, जहां लोग उस वीर को तलाशते हैं, जिसने जनता को माफिया राज से मुक्ति दिलाने का काम किया था और जिसके लहू से हिंदुत्व के गौरव और साहस की कहानी लिखी गई।



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