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सोनभद्र का 'खूनी खेल': 7 मजदूरों की मौत, रसूखदारों पर मेहरबानी और सिस्टम की 'लीपापोती'

by admin@bebak24.com on | 2025-11-25 18:25:26

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सोनभद्र का 'खूनी खेल': 7 मजदूरों की मौत, रसूखदारों पर मेहरबानी और सिस्टम की 'लीपापोती'

अजय सिंह

सोनभद्र (ओबरा): एशिया की 'ऊर्जा राजधानी' कहे जाने वाले सोनभद्र की पहचान अब 'मौत की खदानों' से होने लगी है। बीते 15 नवंबर 2025 को ओबरा थाना क्षेत्र के बिल्ली-मारकुंडी स्थित 'कृष्णा माइनिंग वर्क्स' में हुए दर्दनाक हादसे ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि यहाँ मजदूरों की जान की कीमत पत्थर के टुकड़ों से भी कम है। दोपहर के वक्त जब ड्रिलिंग का शोर गूंज रहा था, तभी पहाड़ का एक विशाल हिस्सा मौत बनकर गिरा और 300 फीट गहरी खाई में जिंदगी हमेशा के लिए दफन हो गई।

प्रशासनिक दावों के अनुसार, NDRF और SDRF के 70 घंटे चले रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद 7 मजदूरों के शव बरामद किए गए। लेकिन इस हादसे की गूंज और इसके पीछे की आपराधिक लापरवाही की कहानी शवों के निकलने के साथ खत्म नहीं हुई, बल्कि अब शुरू हुई है।


सीएम के दौरे के साये में 'प्रशासनिक खेल'

विडंबना देखिए, जिस वक्त यह हादसा हुआ, घटनास्थल से महज 5 किलोमीटर की दूरी पर सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ का कार्यक्रम प्रस्तावित था। उम्मीद थी कि सीएम की मौजूदगी के डर से प्रशासन बिजली की गति से कार्रवाई करेगा। कार्रवाई हुई भी, लेकिन वह न्याय दिलाने के लिए कम और 'खानापूर्ति' के लिए ज्यादा दिखाई दी।

घटना के 10 दिन बीत जाने के बाद भी खदान के असली मालिक और रसूखदार पट्टाधारक पुलिस की पकड़ से दूर हैं। पुलिस ने कार्रवाई के नाम पर चार माइनिंग स्टाफ और एक अधिवक्ता (चंद्रशेखर सिंह) को गिरफ्तार किया है। इस गिरफ्तारी ने ओबरा तहसील के वकीलों को आंदोलित कर दिया है। तस्वीर गवाह है कि कैसे अधिवक्ताओं ने थाने पहुंचकर पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि पुलिस मुख्य आरोपियों को बचाने के लिए 'छोटी मछलियों' और निर्दोष पेशेवरों को बलि का बकरा बना रही है। गठित SIT (विशेष जांच दल) की सुस्त रफ्तार भी संदेह के घेरे में है।


मुआवजे की मांग और विपक्ष का हल्ला बोल

इस त्रासदी ने राजनीतिक गलियारों में भी हलचल तेज कर दी है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अजय राय ने मौके पर पहुंचकर इसे 'मानव-जनित हत्या' करार दिया। जिला कांग्रेस उपाध्यक्ष बृजेश तिवारी का कहना है, "यह महज हादसा नहीं, हत्या है। हमारी स्पष्ट मांग है कि प्रत्येक मृतक के परिवार को 50 लाख रुपये का मुआवजा और एक सरकारी नौकरी दी जाए। सरकार दोषियों को संरक्षण देना बंद करे।"

वहीं, अपना दल (एस) के युवा मंच के प्रदेश उपाध्यक्ष आनंद पटेल 'दयालु' ने इस मामले में एक अलग और व्यावहारिक दृष्टिकोण रखा है। उन्होंने कहा, "सिर्फ मुकदमों से पीड़ित परिवारों का पेट नहीं भरेगा। जो चले गए, वे अपने घर के एकमात्र कमाऊ सदस्य थे। सरकार को चाहिए कि खदान मालिकों से प्रत्येक पीड़ित परिवार को 50-50 लाख रुपये दिलवाए। मुकदमों का खेल तो चलता रहेगा, लेकिन गरीब को तत्काल राशन और पैसे की जरूरत है।"


सर्वेयर और DGMS पर क्यों नहीं होती कार्रवाई?

आनंद पटेल ने एक बहुत ही गंभीर और तकनीकी मुद्दा उठाया है, जो अक्सर शोर में दब जाता है। वह सवाल करते हैं, "दोषी सिर्फ खदान मालिक नहीं हैं, उससे कहीं ज्यादा दोषी वे सर्वेयर (Surveyors) और DGMS (Directorate General of Mines Safety) के अधिकारी हैं, जिनकी नाक के नीचे 300 फीट गहरा अवैध खनन होता रहा। जब मैं वहां खड़ा था, तो बगल की खदान भी मानकों के विपरीत गहरी खोदी गई थी। आखिर अधिकारियों पर मुकदमा कब होगा? जब सब कुछ 'कागजों में सही' था, तो पहाड़ कैसे गिरा?"

उनका यह बयान सिस्टम की उस नब्ज को पकड़ता है जहाँ भ्रष्टाचार की जड़ें हैं। बिना अधिकारियों की मिलीभगत और 'चढ़ावे' के सुरक्षा मानकों को ताक पर रखकर इतना गहरा खनन असंभव है।


खनन को 'उद्योग' का दर्जा देने की मांग

हादसे के बाद हजारों लोगों के रोजगार पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। ओबरा, डाला और चोपन का पूरा अर्थतंत्र पत्थर खनन पर टिका है। आनंद पटेल मांग करते हैं कि खनन को 'उद्योग' का दर्जा देकर इसे वैज्ञानिक और सुरक्षित तरीके से चलाया जाए, ताकि मजदूरों की जान भी सुरक्षित रहे और क्षेत्र का व्यापार भी प्रभावित न हो।


निष्कर्ष: न्याय या सिर्फ फाइलें?

फिलहाल, मृतक इंद्रजीत के भाई छोटू यादव की तहरीर पर भारतीय न्याय संहिता (BNSS) 2023 की धारा 105 (गैर-इरादतन हत्या) के तहत FIR संख्या 0264 दर्ज कर ली गई है। नामजद आरोपियों में मधुसूदन सिंह (पूर्व ब्लॉक प्रमुख) और दिलीप केशरी शामिल हैं, लेकिन गिरफ्तारी शून्य है।

यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है। सवाल अब भी वही है—क्या प्रशासन असली गुनाहगारों (रसूखदार मालिकों और भ्रष्ट अधिकारियों) के गिरेबान तक हाथ डाल पाएगा, या फिर कुछ मुंशी-मुनीम और वकीलों को जेल भेजकर फाइल बंद कर दी जाएगी? उन 7 परिवारों के आंसू तब तक नहीं सूखेंगे, जब तक उन्हें सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक मदद और असली न्याय नहीं मिलता।



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