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करोड़ों का चूना, कागजों पर चमचमाते और जमीन पर दम तोड़ते आरआरसी सेंटर: विकास के नाम पर 'सफेद हाथी' कब तक?

by on | 2026-06-26 19:09:20

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करोड़ों का चूना, कागजों पर चमचमाते और जमीन पर दम तोड़ते आरआरसी सेंटर: विकास के नाम पर 'सफेद हाथी' कब तक?


​ब्यूरो रिपोर्ट,

​सेवराई (गाजीपुर)। सरकारी सिस्टम में जनता की गाढ़ी कमाई को पानी की तरह बहाकर कैसे फाइलों में 'स्वच्छ भारत' का सपना पूरा कर लिया जाता है, इसका जीता-जागता और शर्मनाक उदाहरण देखना हो तो गाजीपुर के भदौरा विकासखंड चले आइए। यहाँ पंचायती राज विभाग ने ठोस और तरल कचरे के प्रबंधन के नाम पर करोड़ों रुपये तो फूंक दिए, लेकिन नतीजा क्या निकला? 'ढाक के वही तीन पात'।

​गाँवों को साफ-सुथरा बनाने के लिए लाखों की लागत से बने रिसोर्स रिकवरी सेंटर (RRC) आज खुद बदहाली के आंसू रो रहे हैं। हमारी ग्राउंड रिपोर्ट में जो सच सामने आया है, वह सिस्टम के दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी है।

​9.50 लाख का एक सेंटर, फिर भी लटके हैं ताले!

​सरकारी आंकड़ों की बाजीगरी देखिए—विभाग के कागजों पर सभी सेंटर सरपट दौड़ रहे हैं, कचरे का निस्तारण हो रहा है और गाँव चकाचक हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि लगभग 80 फीसदी सेंटरों पर ताले लटक रहे हैं।

​औसतन 9.50 लाख रुपये की लागत से बने ये सेंटर आज ग्रामीणों के किसी काम नहीं आ रहे। सेवराई, पथरा, खजूरी, उसिया और बक्सड़ा जैसी तमाम ग्राम पंचायतों में बने ये भवन सिर्फ शोपीस बनकर रह गए हैं।

​बदहाली का कड़वा सच: कहीं फर्श धंसी, कहीं गेट ही गायब

​निर्माण में हुए 'खेल' और अनदेखी की बानगी देखनी हो तो इन दो पंचायतों का हाल सुनिए:

​गोड़सरा ग्राम पंचायत: यहाँ वित्तीय वर्ष 2022-23 में सेंटर का निर्माण हुआ था। तीन साल बीत गए, लेकिन इस केंद्र का शटर आज तक जनता के लिए नहीं खुला।


​पथरा ग्राम पंचायत: यहाँ के जिम्मेदार तो गजब का 'इंजीनियरिंग दिमाग' लगा गए। चहारदीवारी खड़ी कर दी, टिनशेड डाल दिया, लेकिन मुख्य गेट लगाना ही भूल गए! हद तो यह है कि सेंटर को इतने निचले इलाके में बना दिया गया कि बरसात आते ही यह तालाब बन जाता है। बिना इस्तेमाल के ही दीवार का प्लास्टर उखड़ रहा है और फर्श धंसने से गिट्टियां बाहर आ चुकी हैं।


​बड़ा सवाल: जनता के पैसों की इस बर्बादी का जिम्मेदार कौन?

​साफ है कि बजट ठिकाने लगाने की जल्दबाजी में न तो सही जगह का चुनाव किया गया और न ही निर्माण की गुणवत्ता पर ध्यान दिया गया। भ्रष्टाचार और लापरवाही की बदबू इन बंद पड़े कमरों से साफ आ रही है।

​अधिकारी का रटा-रटाया मोड़:

मामला जब मीडिया के जरिए सामने आया, तो जिला पंचायत राज अधिकारी रमेशचंद उपाध्याय ने हमेशा की तरह एक जांच का झुनझुना थमा दिया है। उनका कहना है कि:

​"जिन केंद्रों का संचालन नहीं हो रहा है, उनकी जांच कराई जाएगी और उन्हें शीघ्र शुरू करने के निर्देश दिए जाएंगे। निर्माण की कमियों को भी दुरुस्त कराया जाएगा।"

​ बेबाक 24' का तीखा सवाल:

साहब! निर्देश तो बाद में दीजिएगा, पहले यह बताइए कि तीन साल से ये सेंटर बंद थे, तो जिम्मेदार अधिकारी एसी कमरों में बैठकर क्या कर रहे थे? कागजों पर इन्हें 'संचालित' दिखाकर किसकी पीठ थपथपाई जा रही थी? जनता देख रही है और जवाब मांग रही है!



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